किसी भी भवन में उसका ईशान कोण (Ishan Kon) अर्थात् पूर्व-उत्तर का कोण उसका वह सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र होता है, जिस पर उसके शुभ प्रभाव निर्भर करते हैं। अत: भवन में इस कोण का विशेष रूप से ध्यान रखने की आवश्यकता है।
ईशान दिशा के स्वामी परमात्मा हैं। अत: भवन में परमात्मा जहाँ निवास करते है उस जगह को स्वच्छ एवं सुंदर बनाकर रखना चाहिए। इस दिशा के ग्रह बृहस्पति हैं, बृहस्पति को देव गुरू माना जाता है। बृहस्पति देवताओं के गुरू हैं। किसी भूखण्ड में जब उसकी नींव भरी जाती है, तब उस भूखण्ड के ईशान कोण में वास्तु पुरुष का सिर माना गया है एवं पैर नैऋत्य में होते हैं। शरीर का मुख्य भाग सिर माना गया है। अत: भवन निर्माण में सावधानियाँ रखें।
इस कोण में न हों ये
अगर वहाँ सेप्टिक टैंक (खारकुई), लेट्रीन, कीचन, स्टेयरकेश (सीढ़ियाँ), जेनरेटर, इन्वर्टर, भारी-भरकम पीलर अन्य खण्डों से ऊँचा एवं ईशान कोण की संधि पर बोरिंग या कुँआ इत्यादि बनाने से ईशान कोण दूषित हो जाता है। वहाँ पर नकारात्मक ऊर्जाओं का आधिपत्य होने लगता है। उस भूखण्ड में रहने वाले सद्गृहस्थ की स्थिति डगमगाने लगती है।
किसी भूखण्ड में ईशान कोण का कटा होना अच्छा संकेत नहीं है। इस संकेत की विवेचना बड़ी मार्मिक है। उदाहरण के तौर पर किसी मनुष्य का सिर नहीं हो तो वह शरीर मृत हो जाता है। यही बात भूखण्ड पर लागू होती है। वहाँ पुुरुषों की संख्या कम होना। अगर संतान होती है, नर संतान न होना। अगर नर संतान होती है, तो विकलांग होना, इनकी संभावना अत्यधिक रहती है। किसी भी सद्गृहस्थ के मकान में ईशान कोण न हो उस भूखण्ड को त्याग देना चाहिए।
किनके लिये उपयुक्त ईशान कोण
ईशान कोण पूजा-पाठ, पठन-पाठन, ज्ञान-ध्यान के लिए उपर्युक्त स्थान है। ईशान कोण पर भूल से भी ओवरहेड टैंक, टीवी एन्टीना एवं किसी प्रकार का टावर न लगवाऐं। पूर्वी ईशान बढ़ने से उस भूखण्ड में रहने वाले व्यक्ति विद्वान होते हैं। उनके नाम की यश-कीर्ति चारों तरफ फैलती है।
उत्तरी ईशान बढ़ने से भूखण्ड में रहने वाले विद्वान के साथ धन कुबेर भी होते हैं। अपनी कार्य कुशलता के कारण सद्गृहस्थ धार्मिक कार्यों में हमेशा अग्रसर रहते हैं। अतिथियों का सम्मान होता है। वंश में कुल को रोशन करने वाले चिराग मिलते हैं।
इंटीरियर में रखें इसका ध्यान
ईशान कोण में इंटीरियर कराते समय इस चीज का विशेष रूप से ध्यान रखा जाय कि वहाँ पर भारी भरकम फर्नीचर नहीं बनाया जाय। उसे देखने में हल्का-फुल्का एवं सुंदर बनाया जाय। गहरे रंगों का प्रयोग न किया जाय। हल्के रंग, हल्का नीला, हल्का हरा, पीला कराने से इस जगह में ऊर्जा का विकास होने लगता है। छोटे बच्चों, विद्यार्थियों तथा घर के बुजुर्ग जो रिटायर्ड हो चुके हैं, उनके शयनकक्ष के लिए यह कोण उपर्युक्त है।
इनका भी रखें ध्यान
ईशान कोण में ईशान की संधि को छोड़ते हुए पूर्वी या उत्तरी ईशान में बोरिंग, अंडरग्राउण्ड टैंक, कुँआ, राम और श्याम तुलसीजी के पौधे लगाऐं। इस स्थान का नीचा होना पूरे भूखण्ड के पानी का बहाव ईशान कोण की तरफ आना भूखण्ड में भवन की बनावट ईशान की तरफ हल्की एवं नैऋत्य की तरफ भारी होना ईशान में बाग-बगीचा होना, सकारात्मक ऊर्जा वर्द्धन करने में सहयोगी है। भूखण्ड के अंदर की रचना शास्त्र अनुकूल हो ईशान कोण बड़ा हो उस घर की सुख समृद्धि में बाधा नहीं आ सकती।










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