सेलू माहेश्वरी समाज ही नहीं बल्कि यहां के हर आम व्यक्ति के बीच डॉ. नारायण लोहिया की विशिष्ट छवि है। उनकी नजर में वे एक कुशल चिकित्सक तो हैं ही, लेकिन साथ ही ऐसे समाजसेवी भी जिनके अंदर मानवता को समर्पित भावनाओं से परिपूर्ण हृदय धड़कता है।
सफलता का आधार है। सकारात्मक सोच और निरंतर प्रयास। इस ध्येय वाक्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति ही जीवन में सफल होते हैं। यही कारण है कि माहेश्वरी समाज का प्रतीक चिह्न भी सेवा, त्याग, सदाचार का प्रतीक है। इस बहुद्देशीय चिह्न को अपने जीवन में पूर्णतः स्वीकार करने वाले व्यक्तित्व है, डॉक्टर नारायणदास लोहिया। वैसे भी चिकित्सा सेवा प्रत्यक्ष रूप से समाजसेवा से जुडी हुई है एवं मानवता के दृष्टिकोण से इसका विशिष्ट स्थान है। बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की भावना से ओतप्रोत श्री लोहिया सामाजिक क्षेत्र में भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। सादगी, सौम्यता, सदाशयता एवं सहायता आपके व्यक्तित्व के प्रच्छन्न गुण रहे हैं। आमतौर पर माना जाता है कि धन की वृद्धि के साथ-साथ सरलता कम होती चली जाती है, लेकिन ऐसा नहीं है, ऐसा तो तभी संभव है, जब संपन्नता का नशा सिर चढ़कर बोलने लगे। इसी का उदाहरण है, डॉक्टर श्री लोहिया। ऐसी ही सरलता उनकी धर्मपत्नी पुष्पादेवी लोहिया में भी हैं।
संघर्षों से जीवन की शुरुआत:
डॉ. नारायण लोहिया का जन्म 16 नवंबर 1946 को पिपलोद में हुआ। पिता श्री केवलचंद लोहिया एवं माता श्रीमती राधाबाई लोहिया की वे तीसरी संतान थे। संयुक्त परिवार में पले बढ़े। गांव में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ वह अपने पिता तथा काका के व्यवसाय में भी सहायता करते थे। आपका समग्र जीवन संघर्ष, साहस, सहिष्णुता एवं संवेदना से संपूरित रहा। अल्पायु में ही माता-पिता के स्नेह से भी वंचित होना पड़ा। काकाजी मोहनलाल लोहिया एवंम काकीजी जेठाबाई- मोहनलाल लोहिया के स्नेह व मार्गदर्शन में इन्होंने अपनी मीडिल स्कूल की पढ़ाई पूर्ण की।
परेशानियों से हार न मानी:
आपने चिकित्सा क्षेत्र की शिक्षा अकोला से अर्जित की। कुछ वर्षों बाद पिपलोद से सेलू घोराड सपरिवार स्थायी हो गए। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने तथा अनेक परेशानियों के बावजूद आपने हिम्मत नहीं हारी तथा अथक परिश्रम, मेहनत व ईमानदारी के बल पर आप चिकित्सा के क्षेत्र में सतत आगे बढ़ते गए। वर्तमान में इसमें आपकी विशिष्ट पहचान है। लोहिया दंपति की प्रेरणा, सूझबुझ एवं प्रयास से आर्थिक दृष्टि से कमजोर व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्यों में हमेशा ही तत्परता दिखाई दी। बूंद-बूंद से मिलकर ही सागर बनता है। अपने लिये तो सभी जीते हैं पर जो दूसरों के लिए जीता है। वस्तुः उसी का जीना सार्थक है। यही उनके जीवन का ध्येय है। आपके सुपुत्र डॉ. विनोद एवं डॉ. सोहन आपके ही पदचिह्नों पर अग्रसर होते हुए नेत्र चिकित्सा क्षेत्र में सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। भाई गोपालदास एवं भतीजे आशीष लोहिया तकनीकी ज्ञान से कृषि व्यवसाय में नित नई ऊचाइयां हासिल कर रहे हैं। डॉ. लोहिया व श्रीमती लोहिया दोनों ही समाजसेवा में भी समर्पित हैं।










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