ख़्वाईशो के बोझ में बशीर..तू क्या क्या कर रहा है..
इतना तो जीना भी नहीं…जितना तू मर रहा है…
तूँ भी खामख्वाह, बढ रही है, ए धूप;
इस शहर में पिघलने वाले, दिल ही नहीं हैं।
हर हाल में हंसने का हुनर पास था जिनके
वो रोने लगे हैं तो कोई बात तो होगी।
मयखाने से पूछा आज इतना सन्नाटा क्यों है,
बोला साहब लू का दौर है शराब कौन पीता है।
तेरे हर अंदाज अच्छे लगते हैं,
सिवाय नजर अंदा़ज करने के।
बात तेरी जुबा से हमे सुनना है
शायरी का मतलब लोग अनेक निकालते हैं।
तुम सोचते होगे की आज याद नहीं किया,
कभी भूले ही नहीं तो याद क्या करें।
फ़र्क़ लिखती है हर एक की किस्मत को ज़िन्दगी
न जाने कई बार इश्क़ एक जैसा क्यों लिख देती है..
बड़ी नर्म सी ज़मी बनाई है ख़ुदा ने..मेरे ईमान-ए-दिल की..
मेरे ज़हन में..सबकुछ पत्थर की लकीरों सा दर्ज़ होता है।
“तू क्या-क्या कर रहा है”- ज्योत्सना कोठारी, मेरठ
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