बुजुर्ग किसी परिवार या कुल विशेष में ही पूज्य नहीं होते। आयु के साथ ज्ञान वृद्ध का तो सदा सर्वदा सभी सभाओं में ही आदर होता है। सच तो ये है कि जिस समाज में बुजुर्ग का सम्मान नहीं होता और उनकी बात या आज्ञाओं का अनुसरण नहीं होता, वह समाज दिशाहीन हो जाता है।
जो अपने घर, बिरादरी के बड़े-बूढ़ों की हितकारी शिक्षाओं का उल्लंघन करते हैं, वे रावण या दुर्योधन की तरह कुल के नाश और जीवन के अंत का कारण बनते हैं। रामकथा में अपने बुजुर्ग नाना माल्यवान सहित हितैषियों की सलाह न मानकर रावण को जीवन और राज्य दोनों से हाथ धोना पड़ा। महाभारत के उद्योग और भीष्म पर्वों में दुर्योधन का व्यवहार इसका उदाहरण है।
अपने बुजुर्ग पितामह भीष्म, पिता धृतराष्ट्र और चाचा विदुर समेत बूढ़े गुरु द्रोण और कृपा की हर भली बात को दुर्योधन ने ठीक वैसे ही नकारा जैसे रोगी अंतकाल में औषधियों को अस्वीकार कर देता है। परिणाम में महाभारत का महासंहारकारी संग्राम हुआ।
शल्य पर्व का अद्भुत प्रसंग है। कुल 18 दिन के युद्ध में अंतिम दिन भीम ने गदा युद्ध में दुर्योधन को धराशायी कर दिया। दुर्योधन पराजित होकर गिरा तब कराहते हुए भगवान श्रीकृष्ण को युद्ध के लिए जिम्मेदार बताते हुए कोसने लगा।
तब मरणासन्न दुर्योधन को फटकारते हुए भगवान ने जो कहा, वह बुजुर्गों के संदर्भ में कीमती वचन हैं। इसलिए कि अपने पाप का फल भोगते दुर्योधन को भगवान ने अंतिम अवसर पर भी बुजुर्गों की महत्ता ही याद दिलाई। भगवान बोले, ‘मूर्ख! तुमने कभी बुजुर्गों की उपासना नहीं की। तुम्हारी पराजय उसी का परिणाम है।’
आशय ये कि बुजुर्गों की उपासना विजय और अवहेलना पराजय करा देती है। बुजुर्ग आयु और ज्ञान में ही नहीं, जीवन के अनुभव में भी बड़े होते हैं। उनका कहा हमेशा हितकर ही होता है। कभी पल भर किसी बुजुर्ग के पास बैठिये तो, बरगद की घनी छाँव-सी अनुभूति होगी।
उनकी उपस्थिति दिव्य है, उनका सत्संग सौभाग्य और उनकी सेवा जीवन की सार्थकता। इसीलिए तो हमारे शास्त्र कहते हैं, जिस घर, कुल या समाज में बुजुर्ग नहीं होते और उनसे परामर्श नहीं किया जाता, वह कुल और समाज संपन्न भले हो जाए, श्रेष्ठ नहीं हो पाता। श्रेष्ठता और सार्थकता के लिए बुजुर्गों की कृपा चाहिए ही।
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