महाभारत के आश्वमेधिक पर्व के 90वें अध्याय की सुप्रसिद्ध कथा दान की महिमा का बोध कराती है। महायुद्ध में विजय के बाद महाराज युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया। उस महायज्ञ में प्रतिदिन दस लाख ब्राह्मण भोजन करते थे। कथा के अनुसार जिस दिन यज्ञ का समापन हुआ, कहीं से एक विचित्र नेवला भोजनशाला में आया।
उसकी आँखें नीली थी और शरीर का एक ओर का भाग सोने का था। आश्चर्य से सब लोग उसके आसपास जमा हो गए। तभी नेवला मनुष्यों की वाणी में युधिष्ठिर से बोला, ‘राजन्! आपका यह यज्ञ और लाखों लोगों को कई दिनों तक दिया अन्नदान ‘उस निर्धन ब्राह्मण के सेर भर सत्तू के दान’ की तुलना में ‘दो कौड़ी’ का हैं।
युधिष्ठिर ने पूछा, ‘किस ब्राह्मण का कौन-सा दान?’ तब नेवले ने अपना अनुभव युधिष्ठिर समेत सभी उपस्थितों को कह सुनाया। नेवले ने बताया कि एक बार कुरुक्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा। लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए। एक तपस्वी ब्राह्मण जिसके परिवार में पत्नी, बेटा और बहू समेत कुल चार लोग थे, वे भी अकाल के कारण कई दिनों से भूखे थे। एक दिन घर के मुखिया को कहीं से सेर भर जौ मिला और उसका सत्तू बनाकर भगवान को भोग लगाकर, अपना-अपना अन्न भाग लें वे चारों भोजन करने बैठे ही थे कि द्वार पर अतिथि की पुकार सुनाई दी।
अतिथि भी भूखा था और भोजन माँग रहा था। तब पहले से ही स्वयं भूखे घर के मुखिया ने अपनी पत्तल का भोजन उठाकर अतिथि को सादर अर्पित कर दिया। मगर पाव भर सत्तू से अतिथि की क्षुधा शांत न हो सकी। उसने और अन्न की कामना की, इस पर ब्राहाण की पत्नी आई और उसने भी अपना भाग अतिथि देवता के चरणों में समर्पित कर दिया। अतिथि इतने से भी संतुष्ट न हुआ तब पहले गृहस्वामी के पुत्र ने और अंत में गर्भवती पुत्रवधू ने भी अपने जीवन की परवाह किए बगैर अपने-अपने हिस्से का भोजन अतिथि को दान कर धन्यता अनुभव की।
नेवले ने युधिष्ठिर आदि से कहा, जहाँ उस अतिथि के हाथ धुलवाए गए उसी स्थान पर संयोगवश में अपने शिकार की टोह में बैठा था और सौभाग्य से उस सत्तू के कुछ कण मेरे शरीर पर पड़ गए। परिणामत: उन महान अन्न कणों के प्रभाव से मेरे शरीर का एक हिस्सा आश्चर्यजनक रूप से स्वर्णमय हो गया। तभी से इस आस में कि मेरे शरीर का शेष भाग भी सोने जैसा हो जाए, मैं इस जैसे ही अनेकों महायज्ञों की विशाल भोजनशालाओं में जा-जाकर भूमि पर लौट लगाता हूँ।
मैं कई तपोवनों में भी गया हूँ जहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भोजन प्रसादी ग्रहण करते हैं, लेकिन उन पावनतम भोजनालयों में भी मुझे निराशा ही हाथ लगी है। इसीलिए मैंने कहा, ‘नहि यज्ञो महानेव सदृशस्तैर्मतो मम।’ मेरे मत में हे! महाराज युधिष्ठिर! आपका यह यज्ञ उन सेर भर सत्तू के दान के कण भर बराबर भी नहीं है।
इस कथा के प्रतीकों और मर्म को समझने की कृपा करें। नेवला सोने का नहीं होगा और न ही मनुष्यों की बोली बोलेगा मगर कथा यह बोलती है कि दान तो वह है जिसकी हमें सर्वाधिक आवश्यकता हों और देने की नौबत आ जाए तब हम एक पल न सोचे। न मन किंतु-परन्तु में पड़े न देते हुए हाथ सकुचाए। न ही देने के बाद अफ़सोस हो कि क्यों दे दिया! दूसरा युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ की तरह दान का दिखावा न हो, जहाँ एक लाख ब्राह्मणों की पंगत उठने के बाद जोर से शंख बजाकर पूछा जाता था, ‘और कोई भूखा तो नहीं है?
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