महाभारत के अनुशासन पर्व में एक बहुत ही रोचक उमा-महेश्वर संवाद है। इसकी खूबी यह कि पाँच मुख्य सहित 17 उप अध्यायों में देवी पार्वती के प्रश्न और भगवन शिव के उत्तर हैं, मगर अंतिम छंटे मुख्य अध्याय में प्रश्न शिवजी का है और उत्तर पार्वती जी दे रही हैं।
अद्भुत है कि प्रारंभिक अध्याय से लेकर कोई 22 अध्यायों तक वर्णाश्रम, शुभाशुभ कर्म, योनि, लोक, आहार, दान से लेकर राजधर्म, मोक्षधर्म, योगधर्म तक भगवन अपनी पत्नी की जिज्ञासाओं के सुन्दर समाधान सुना देते हैं, मगर स्त्रीधर्म की बात आते ही वक्ता से जिज्ञासु श्रोता बन जाते हैं।
शिवजी कहते हैं, ‘हे देवी! नारी की कही गई बातों को ही नारी समाज अधिक महत्त्व देता है। स्त्रियां पुरुषों की कही गई बातों को अधिक महत्त्व नहीं देती। स्त्रियाँ ही स्त्रियों की परम गति है। संसार में भूतल पर यह बात सदा से प्रचलित है। अतः स्त्रीधर्म क्या है, यह तुम्हीं मुझे समझाओ।’
मात्र 61 श्लोकों वाले इस अंतिम अध्याय के इस प्रसंग की दो बड़ी सीख है। पहली जब सर्वसमर्थ और सर्वज्ञानी शिवजी ‘स्त्रीधर्म’ पर प्रश्न करते हैं तब देवी मुस्कुराकर कहती हैं:
“जो समर्थ होकर भी अहंकार शून्य हो, वही पुरुष कहलाता है। हे महादेव! आप भी ऐसे ही हैं, अतः सब जानते हुए भी मुझसे प्रश्न कर रहे हैं। आशय है स्त्री को मान दे रहे हैं।”
अतः पहली सीख स्त्री को मान देने वाला ही ‘समर्थ पुरुष’ है।
दूसरी सीख, जब शिवजी ने प्रश्न किया तब देवी ने तत्काल ‘ज्ञान वर्षा’ शुरू नहीं की। वे बोलीं,
‘हे महादेव! मै पवित्र नदियों ने स्त्रीधर्म के बारे में कुछ सलाह करके ही कुछ कहूँगी। इसलिए कि पृथ्वी या स्वर्ग पर मै कभी ऐसा कोई विज्ञान नहीं देखती जो अकेले ही, बगैर दूसरों के सहयोग से स्वयं सिद्ध हुआ हो, इसलिए नदियों से सलाह उचित है।’
सीख यह कि अनेक लोगों से सलाह के बाद किया गया कार्य ही सफल होता है।
तब कथा के अनुसार पार्वती जी ने गंगा, व्यास, झेलम, शतलज, यमुना, नर्मदा, कावेरी आदि नदियों से स्त्रीधर्म के बारे में पूछा। इस पर नदियां धन्य हो उठी। सभी की ओर से गंगा ने कहा, ‘हे देवी! आप सभी धर्मों का मर्म जानती हैं। यह तो आपकी कृपा है, जो हमें मान देने के लिए आप हमसे पूछ रही हैं। अब कृपया स्वयं ही स्त्रीधर्म का उपदेश देकर सभी को कृतार्थ कीजिए।
और तब कुल 26 श्लोकों में देवी ने स्त्रीधर्म का मर्म शिवजी तथा उपस्थित नदियों, ऋषियों व भूतों आदि के समक्ष कह सुनाया। बोली,
‘जो पतिव्रता होकर सास-ससुर की सेवा करती तथा अपने माता-पिता के प्रति भी सदा भक्ति भाव रखती हो, वही स्त्री तपस्या धन से संपन्न मानी गई है। जो पति को प्रतिदिन मर्यादा का बोध कराने वाली और काम की थकावट से खिन्न पति को पुत्र के सामान सांत्वना देने वाली हो, वही स्त्रीधर्म के पालन का फल पाती है।’
और अंत में कहा-
एक ओर पति की प्रसन्नता और दूसरी ओर स्वर्ग- ये दोनों नारी की दृष्टि में सामान हो सकते हैं या नहीं, इसमें संदेह है। मगर मेरे प्राणनाथ महेश्वर! मै तो आपको अप्रसन्न रखकर स्वर्ग को नहीं चाहती।
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