घर-परिवार के बड़े-बुजुर्ग हमारे जीवन में ईश्वर की कृपा से ही सुलभ होते हैं। इनका होना सौभाग्य है और न होना दुर्भाग्य। ये हमारे निजी संसार के वे प्रत्यक्ष देवता हैं जो अपने अतीत के अनुभवों से हमारा भविष्य प्रशस्त करते हैं और अपने आशीर्वाद से जीवन का दुर्गम पथ सुगम करते हैं। जो इनकी सुनता है वह विजयी होता है और जो नहीं सुनता वह पराजित।
रामायण और महाभारत के प्रसंग इसके प्रमाण हैं। रामकथा में पिता की आज्ञा के पालक श्रीराम यशस्वी हुए और नाना माल्यवान की न सुनने वाला रावण मारा गया। महाभारत का दुर्योधन बुजुर्गों की अवज्ञा के लिए ही कुख्यात है। दुर्योधन का असल नाम तो सुयोधन था लेकिन बड़ों की अनसुनी ने ही उसे दुर्योधन बना दिया।
महाभारत के अनेक संदर्भों में पिता धृतराष्ट्र को यह पीड़ा व्यक्त करते देखा जा सकता है कि ‘दुर्योधन मेरी सुनता ही नहीं!’ यही दुःख माँ गांधारी का है और यही सन्ताप पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कुलगुरु कृपाचार्य और चाचा विदुर का भी।
बड़ों की न सुनना तो दूर दुर्योधन उससे आगे उनके अपमान को उद्धत रहता था। उसने विदुर को अनेक बार सरेआम कोसा तो जयद्रथ के मारे जाने पर गुरुद्रोण पर ही बुरी तरह भड़क उठा था। वेदव्यास से लेकर कण्व तक और नारद से लेकर मैत्रेय तक जो भी उसे सन्मार्ग का पा’ पढ़ाने आएं, दुर्योधन ने सबकी सीख हवा में उड़ा दी।
महाभारत युद्ध से ठीक पहले महर्षि मैत्रेय जब उसे युद्ध न करने की समझाइश दे रहे थे तो उसने उनकी इतनी उपेक्षा की कि उन्होंने क्रोधित होकर उसे शाप दे डाला था, ‘जा! युद्ध में भीम तेरी जंघा को तोड़ देगा।’ महर्षि गुस्से में राजभवन से उठे और जाते हुए कहा, ‘यदि मेरा कहा मानेगा तो शाप निष्प्रभावी होगा!’ मगर दुर्योधन न माना और मारा गया।
इससे उलट युधिष्ठिर है जो सदा बड़ों का आज्ञापालक है और इसीलिए विजयी भी हुआ और यशस्वी भी। महाभारत के भीष्म पर्व का अनुकरणीय प्रसंग है जो 43 वें अध्याय में दर्ज़ है।
श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को श्रीमद्भागवत गीता के उपदेश के ठीक बाद युद्ध प्रारम्भ होने से पहले युधिष्ठिर रथ से उतरकर नि:शस्त्र हो जब पूर्वाभिमुख होकर शत्रु सेना की ओर पैदल चलने लगे तो शेष पांडव भाइयों के हाथ पैर फूल गए। किसी को समझ न आया कि ऐन युद्ध की घड़ी युधिष्ठिर क्यों आगे रहकर मृत्यु के मुख में जा रहे हैं।
सबने युधिष्ठिर को रोकना चाहा लेकिन ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र मौन होकर कौरव सेना की ओर बढ़ते गए। तब केवल श्रीकृष्ण उनका मनोरथ समझ पाए और उन्होंने भीम-अर्जुन आदि को रोका और समझाया कि ‘युधिष्ठिर बड़ों का आशीर्वाद लेने जा रहे हैं!’
कथा के अनुसार युधिष्ठिर ने क्रमशः भीष्म, द्रोण, कृप और मामा शल्य को शीश नवाया, चरण छुए। बदले में सबने जीत का आशीष दिया और वरदान दिए। भीष्म ने अपनी मृत्यु का रहस्य बताने का भरोसा दिलाया तो शल्य ने युद्ध में कर्ण को हतोत्साहित करने का वचन दिया।
चारों ने कहा, ‘पार्थ! तुम न आते तो हम तुम्हें शाप दे देते मगर तुम आए हो तो आशीष देते हैं कि विजय तुम्हारी ही होगी।’ ये अंतर है युधिष्ठिर और दुर्योधन के आचरण और व्यवहार का और इसी में दोनों की प्राप्ति का सूत्र छुपा है।
दुर्योधन ने अपने कुव्यवहार से बड़ों का हृदय दुखाया और पूरे परिवार का नाश करा लिया। दूसरी ओर युधिष्ठिर है जिसने अपनी विनम्रता से शत्रु सेना के बुजुर्गों का आशीर्वाद, वरदान और विजय सब कुछ पा ली। मत भूलिए जो घर के बुजुर्गों का मन दुखाएंगे वे कभी सुख न पाएंगे और जो उनके प्रति नत होंगे उनकी जय ईश्वर भी न रोक सकेगा!














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