सकारात्मक विचार

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अपनी दृष्टि हमेशा सकारात्मक और अच्छी ही रखना चाहिए जिससे विचार भी हमेशा सकारात्मक ही रहें।

ले चलते हैं, आपको उस प्राचीन समय में जब आजकल के समान विद्या अध्ययन के लिए स्कूल नहीं, बल्कि विद्यापीठ हुआ करते थे। जहां गुरु के समीप आश्रम में रहकर बच्चे अध्ययन करते थे। ऐसा ही एक बड़ा विशाल विद्यापीठ बनारस में था, जहां के गुरु थे – देवाशीष। वे अपने शिष्यों को बड़े समर्पित भाव से पढ़ाते थे और रखते थे।

एक बार गुरुजी अपने शिष्य धनंजय के साथ दूसरे विद्यापीठ जाने के लिये निकले। जिस नदी से पार होकर उन्हें जाना था, वहीं किनारे पर एक 20-25 साल की महिला भी उस पार जाने के लिए खड़ी थी। ये दोनो गुरु-शिष्य जैसे ही नदी के पास पहुंचे, बहुत जोर से एक लहर आई। महिला डर गयी।

उसका पाँव फिसल गया। वह नदी में डूबे उससे पहले ही गुरुजी दौड़ कर वहां पहुंचे और जोर से उस महिला का हाथ पकड़कर ऊपर खींच लिया और फिर सहारा देकर नांव में बैठा दिया।शिष्य यह सब दृश्य देख रहा था। उसके मन में विचारों के घोड़े दौड़ने लगे कि मेरे गुरुजी ने यह क्या किया? एक महिला का हाथ पकड़ना क्या उन्हें शोभा देता है?

इतने पहुंचे हुए विद्वान हमें तो शिक्षा देते हैं और खुद ऐसा कार्य करते है। पूरे रास्ते नांव में बैठे-बैठे शिष्य के मन में ये ही विकल्प चलते रहे। किनारे पहुंचकर भी मन शांत नहीं हुआ। वह गुरुजी से बोला, आप निकल जाइये गुरुजी, मैं कुछ देर रूक कर आता हूं।

तभी महिला नांव में से उतरी, उसने गुरु देवाशीष के चरणस्पर्श किये और उनका आभार मानकर आगे निकल गयी। वह तो निकल गयी पर इधर धनंजय के दिमाग में तूफान पैदा कर गयी। धनंजय दिन भर इन्हीं विचारों में खोया रहा गुरुजी ने कैसे उस महिला का हाथ पकड़ा। विचारों का तूफान लिए शाम हो गयी।

अब वह जैसे-तैसे उस आश्रम पहुंचे, जहां उन्हें ठहरना था। गुरुजी ने रात्रि में विश्राम के पहले धनंजय से पूछा – ‘क्या बात है? क्या विकल्प चल रहे हैं, वत्स?’ अब इससे रहा नहीं गया और गुरुजी से पूछ ही लिया – ‘आपने ऐसा कृत्य क्यूँ किया? एक महिला का हाथ पकड़ना क्या उचित है?’

गुरुदेव ने उसके सिर पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया – ‘तुम अभी तक उस महिला को पकड़कर बैठे हो? मैंने तो उसकी जान बचाने के उद्देश्य से उसका हाथ पकड़ा, नांव में बैठाकर छोड़ भी दिया। मुझे उस समय जान बचाने के अलावा और कुछ नजर नहीं आया, पर तुमने क्या-क्या देख लिया वत्स!

अपनी दृष्टि हमेशा सकारात्मक और अच्छी ही रखो, शिष्य एकटक गुरुजी की ओर देख रहा था और उनकी बाते सुन रहा था। सही बात है, मैने दिनभर एक छोटी-सी बात को लेकर अपना कितना दिमाग खराब किया।

विवेक कुमार चौरसिया


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