जंगल में चुनाव होने वाले थे। मतदान के तारीखों का ऐलान हो चुका था। चुनाव जीतने के लिए इस बार शेर ने कूटनीति अपनाई।
उसने जंगल में यह घोषणा करवा दी, जब तक चुनाव नहीं हो जाते जंगल में कोई भी मांसाहारी जंतु दूसरे किसी जानवर का शिकार नहीं करेगा। सभी जानवरों को शुद्ध शाकाहारी रहना होगा। अगर किसी भी जानवर ने किसी दूसरे प्राणी का शिकार किया और मुझे जानकारी मिल गई तो मैं उसे कठोर से कठोर दंड दूंगा।
इस घोषणा से जंगल के सारे शाकाहारी प्राणी निडर होकर विचरण करने लगे। दो-तीन दिन बाद ही एक सियार की आंते ऐंठने लगी। जब भूख सहन नहीं हुई तो वह शेर के पास पहुँचा और बोला, दादा बड़ी जोरो की भूख लगी है, आखिर ऐसा कब तक चलेगा? अभी तो कई दिन बाकी है वोट पड़ने मे, अब तो शिकार करने की छूट दे दो।
शेर ने सियार का कन्धा थपथपाते हुए कहा, अरे मूर्ख, कुछ दिन और सबर कर ले, कुछ समय शाकाहारी बना रह। चुनाव सिर पर है और मुझे किसी भी कीमत पर इसे जीतना ही है। एक बार मे जीत लूँ फिर तू कर लेना अपने जी भर की मनमानी। तब तुझे मै भी नहीं रोकूंगा।
अरे बावले, तुझे मालूम है, इंसान की बस्ती के चुनाव में भी ऐसा ही होता है। चुनाव से पहले, सब बड़े-बड़े वादे करते हैं और जीतते ही सब अपनी मनमानी पर उतर आते हैं, कोई कुछ नहीं कर पाता। कुछ समझा….
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