घर परिवार, समाज या संगठन में जब मुट्ठी भर स्वार्थी और लोभी लोग बेक़ाबू हो जाए और सशक्त और बड़े-बुज़ुर्ग या तो धृतराष्ट्र की तरह “अंधे” हो जाए या भीष्म-द्रोण की भाँति “चुप्पी-साध” लें तब “महाभारत” रोके नहीं रुकती! इसलिए कि जिस भी समाज में “लोकतंत्र” कि अवहेलना कर “एक पक्ष को लाभ” और “दूसरे पक्ष कि उपेक्षा” कर “भेदभाव” किया जाता है, वहाँ “धर्म की हानि” होती है और अंततः “विनाश” होता ही है।
महाभारत के उद्योगपर्व की कथाएँ इसकी सच्ची गवाही देती है। नियमानुसार 13 वर्ष का वनवास काट लेने के बावजूद जब ध्रतराष्ट्र “धन के मोह” और “अपनों को सत्ता देने के स्वार्थ” में पांडवों को यथोचित राज्यभाग देने पर राज़ी ना हुआ तब उसे विदुर और संजय ने खूब समझाया। इस पर्व के 36 वें अध्याय में विदुर की सीख बताती है कि जिस भी समाज में “प्रमुख पद पर विराजमान प्रधान” भेदभाव करता है, वह किस तरह अमङ्गलकारी युद्ध में जूझकर नष्ट हो जाता है।
अध्भुत सूत्र हैं जो हर देशकाल में “भेदभाव” से बचने की सलाह देते हैं। यथा विदुर ने कहा हे राजन! “आपस में फूट रखने वाले लोग अच्छे बिछौनो से युक्त पलंग पाकर भी कभी सुख की नींद नहीं सो पाते, जो परस्पर भेदभाव रखते हैं, वें कभी धर्म का आचरण नहीं करते। न वे सुख पाते हैं, न ही उन्हें गौरव की प्राप्ति होती है। यहाँ तक कि उन्हें शांतिवार्ता भी नहीं सुहाती।”
“हे राजन! जलती हुई लकड़ियाँ अलग-अलग होने पर धुआँ फेंकती हैं और एक साथ होने पर प्रज्ज्वलित हो उठती हैं, इसी प्रकार जाती बंधु भी फूट होने पर दुःख उठाते और एकता होने पर सुखी रहते हैं।”
“परस्पर मेल होने और एक से दूसरे को सहारा मिलने से समाज या जाती के लोग ठीक उसी प्रकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं, जैसे तालाब में कमल”
और विदुरजी का सर्वोत्तम वचन-
“हित की बात भी कही जाए तो उन्हें अच्छी नहीं लगती। उनके योगक्षेम की भी सिद्धि नहीं हो पाती। राजन! भेदभाव वाले पुरुषों की विनाश के सिवा और कोई गति नहीं है।”
हम जानते हैं धृतराष्ट्र ने इन उपदेशों को अनसुना किया और कुल का नाश हो गया। समाज में जब कभी ऐसी नौबत आए और भेदभाव, मोह और लोभ के कारण आपस में ही “युद्ध” संभावित लगे तब इस कथा को स्मरण कर लेना चाहिए।
-डॉ. विवेक चौरसिया
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