आचार्य द्रोण के 100 कौरव व पाँच पाण्डव सहित 110 से अधिक शिष्यों में अकेले अर्जुन क्यों सबसे अलग, सबमें श्रेष्ठ और सदियों बाद आज तक समूची मानव जाति के ‘नायक’ और प्रेरक हैं, यह समझना हो तो हमें द्रोण के गुरुकुल में झांकना पड़ेगा।
विशेषकर उन बच्चों को जब अभी विद्यार्थी हैं, ताकि वे जान सकें कि ‘प्रतिभा’ जन्मजात तो होती ही है, लेकिन गुरु के प्रति समर्पण, सेवा, श्रम, साधना, समझदारी, सजगता, सतर्कता और एकमात्र ‘लक्ष्य’ पर नज़र रखने से किस तरह भीड़ में एक को ‘अर्जुन’ बना देती है।
विद्यार्थियों की भीड़ में अर्जुन के ‘अर्जुन’ बनने की कथा महाभारत के आदिपर्व के 131 और 132वें अध्याय में लिखी है। अपने विद्यार्थी जीवन के इन्हीं कुछ वर्षों में अर्जुन ने अपने अन्य भाइयों से हटकर जो किया, उसी ने उन्हें आगे चलकर महाभारत का महानायक बना कर चिर यशस्वी बना दिया।
समझने के लिए पाँच प्रसङ्ग सार रूप में यूँ हैं:
पहला, जब शिक्षा प्रारम्भ से ठीक पूर्व गुरु ने सभी बच्चों को बुलाकर कहा, ‘शिक्षा पूरी होने के बाद मैं जो कहूंगा, मेरी वह इच्छा तुम्हें पूरी करना होगी।’ तब आचार्य की बात सुनकर केवल अर्जुन ने ‘हाँ’ कहा, बाक़ी सब चुप रहे। इस ‘समर्पण’ से गदगद हो उसी पल आचार्य ने अर्जुन को ‘चुन’ लिया था। गुरु इतने भावुक हुए कि रो पड़े थे।
दूसरा, द्रोण पानी भरने के लिए सब शिष्यों को कमण्डलु देते थे, लेकिन अपने पुत्र अश्वत्थामा को बड़े मुँह का घड़ा। उद्देश्य था अश्वत्थामा जल लेकर शीघ्र आ जाए और बाकी देर से ताकि उनका बेटा दूसरों के मुकाबले एक पाठ अधिक सीख सकें। बाक़ी द्रोण की चाल में फंसे रहे, केवल अर्जुन ने इसे समझा।
परिणाम यह कि जैसे ही द्रोण पानी लाते भेजते, अर्जुन दौड़कर जाते और आते। उन्होंने अपनी ‘सजगता’ के बूते वह ‘अतिरिक्त’ भी सीखा जो द्रोण केवल अपने बेटे को ही सिखाना चाहते थे।
तीसरा, द्रोण ने गुरुकुल के रसोइये को आज्ञा दी थी कि अर्जुन को कभी अंधेरे में भोजन न परोसना। इसी बीच एक दिन देर शाम अर्जुन भोजन कर रहे थे कि तेज हवा से दीपक बुझ गया मगर अर्जुन भोजन करते रहे। अभ्यासवश उनका हाथ मुँह से अन्यत्र न गया।
बस फिर क्या था, ‘अभ्यास ही चमत्कार है’ यह मानकर अर्जुन ने रात के अंधेरे में ही बाण चलाने का अभ्यास शुरू कर दिया। जब सब सोते थे तब अर्जुन ‘जागते’ और ‘अभ्यास’ करते थे।
चौथा, एक दिन द्रोण गङ्गा नदी में स्नान कर रहे थे। तभी एक मगर ने उनका पैर पकड़ लिया। उस समय सारे शिष्य नदी तट पर थे। द्रोण ने आज्ञा दी, ‘इस ग्राह को मारकर मुझे बचाओ!’ तब जब सब मगर को देख हक्के-बक्के रह गए, अकेले अर्जुन ने बड़ी फुर्ती से धनुष-बाण उठाकर मगर को मार डाला और द्रोण की प्राणरक्षा की।
तब प्रसन्न हो गुरु ने उन्हें ब्रह्मशिर नामक दिव्यास्त्र का उपदेश दिया। ‘सतर्कता’ और ‘प्रत्युतपन्न मति के साथ कर्म’ ने उन्हें द्रोण का प्रिय पात्र बना दिया।
पाँचवा, शिक्षा पूरी होने पर परीक्षा की घड़ी आई। आचार्य ने पेड़ पर एक नकली गिद्ध टांगा और सभी शिष्यों को बुलाकर पूछा, ‘बोलो, तुम्हें क्या-क्या दिखाई देता है?’ सभी को वृक्ष, बादल, गुरु आदि बहुत कुछ दिखाई दिए किन्तु अकेले अर्जुन को केवल गिद्ध नज़र आया।
गुरु की आज्ञा पर अर्जुन ने बाण साधा और ‘लक्ष्य’ का संधान कर डाला। तब प्रसन्नचित गुरु ने अर्जुन को ह्रदय से लगा लिया था।
साधो! समझदार के लिए संकेत पर्याप्त है और मूर्ख के लिए महा विस्तार भी निरर्थक है। इन सन्दर्भों से आप और हमारे बच्चे समझ सकते हैं कि प्रतिभा को निखारने के लिए हमें कब क्या कैसे करना है।
-डॉ विवेक चौरसिया














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