जियो तो ऐसे जियो

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उम्र के उत्तरार्द्ध में हम नकारात्मकता से ओत-प्रोत रहते हैं। आखिर क्यों? जियो तो ऐसे जियो की आखिर इस उम्र में हमारे पास खोने के लिए क्या है? और हमने जितना खोया उससे अधिक पाया भी है। आखिर क्यों है, यह निराशा?

‘क्या हम वो आखरी पीढ़ी हैं? नहीं हम वो पहली पीढ़ी हैं। आए दिन वाट्सएप पर कुछ ऐसे मैसेज आते हैं और हम अर्थात वरिष्ठ नागरिक पलक झपकते उसे फारवर्ड करते हैं और फिर निराशा के अंधेरे में बुदबुदा कर कहते हैं ‘हम तो आखिरी पीढ़ी हैं’ और शुरू करते हैं मातम का सिलसिला ‘दुःखी होने का सिलसिला’ रोने और रूलाने का सिलसिला।

बढ़ती उम्र का भय इसमें तड़का लगाता है और निराशा की तस्करी में हमें परोसता है। हम अपने समस्त हम उम्र साथियों के साथ उलाहने के रूप में ऐसे दूसरी पीढ़ियों को भी सुनाने लगते हैं।

बातचीत का सिलसिला शुरू करते हैं ‘हमारे जमाने में’ की शान से और समाप्त होता है बुरा-सा मुुंह बनाकर नकारात्मक सोच और शब्दों के साथ क्यूं हैं हम में ये निराशा?


‘मृत्यु का सामना करने से कतरा रहे हैं? या जीवन के घूटने का भय सता रहा है?’ जहां तक मैं समझती हूं मृत्यु के सामने का डर नहीं होगा क्योंकि हम उसके बारे में जानते ही नहीं हैं। हमें नहीं मालूम है कि क्या होगा और जब हम रहेंगे ही नहीं तो कैसे कुछ होगा?

पढ़े लिखे हम लोग अब यह भी समझ गये हैं कि गरुड़ पुराण में लिखे और पंडितों द्वारा हॉरर मूवी की तरह दिखाए वो सारे किस्से भी झूठे ही हैं क्योंकि दूसरे पुराणों ने ही हमें यह भी बताया है मृत्यु के रहस्य को कोई नहीं समझा।

विज्ञान ने बता दिया कि शरीरी पुर्जों की कार्यशक्ति खत्म हुई इसलिये उसके साथ उसका सब कुछ खत्म हो गया। ‘तो हम क्यों दुखी हों? या हम क्यों ना सुखी हों?’

जब से होश संभाला दौड़ पड़ते रहे, दौड़ में बने रहने के लिए या दौड़ में दूसरों से जीतने के लिये मृगतृष्णा की तरह बेतहाशा भागते रहे। किस्मत वाले हैं हम कि हिरण की तरह पानी के लिये दम नहीं तोड़ा। हमारे हिस्से का पानी हमें मिल भी गया और पीकर तृप्त भी हो गये।


जियो तो ऐसे जियो

‘तृप्ति के बाद तपिश क्यूं?’ आराम के दिन हैं दौड़ खत्म हुई, फल जो न हो हमारे हाथ में हैं। इच्छाओं ने तंग करना छोड़ दिया है। बड़ी चाहतें अब बची नहीं, भोजन ज्यादा चाहिये नहीं, कपड़े जितने वह पूरे हैं, एक मुकाम मिल ही गया है जो पेड़ बोया था वह बोये हुए बीज के अनुरूप और उसको मिली खाद-पानी के परिणाम स्वरूप फलफूल गया है।

भागदौड़ करते-करते जो वक्त कम पड़ रहा था वह वक्त अब बांह फैलाये हमारे पास आया है। मनचाही चीज जब पास आई है, मन चाही मिठाई मिली है तो आराम से चखिये, चखाइये और उसके स्वाद का आनंद उठाइये।

‘क्या आनंद उठाना आपको अच्छा नहीं लगता? या आनंद उठाना आपको आता ही नहीं है?’ पूरी जिंदगी जिन चीजों से बेहतर पाना चाहते थे, जिन सामानों को बदलना चाहते थे, जिन व्यवस्थाओं से व्यथित होते थे, जिन अविष्कारों की आवश्यकता महसूस करते थे, आज जब वह सब मिल गया, क्यूं सोचें कि हम आखरी पीढ़ी हैं?

क्यूं नहीं सोचते और सोच सोच कर खुश होते हैं कि हम वो पहली पीढ़ी हैं जिसने विकास और बदलाव को जितनी तेजी से बदलते देखा हमसे पहले किसी ने अपने जीवन की इस गति का आनंद और चमत्कार देखा है।


‘हम वो पहली पीढ़ी है’ जिसने मिट्टी के घर पोते, पक्के एक दो मंजिलें मकान भी देखे, मल्टी स्टोरी, फाइन प्लास्टर, सुंदर इंटीरियर कांच के महल भी बनाए। जिसने न ही कुए से पानी भरा, हैडपंप चलाये और चौबीस घंटे घर के हर नल से पानी पाया। जिसने सायकल के पैडल मारे, स्कूटर दौड़ाया, कार एक से एक बेहतर जिंदगी भी चलाई।

जिसने रेलगाड़ी की सीट के लिये लाइन लगाई और वायुयान में शान से जिसे किसी ने सीट पे बैठाया। जिसने सात समंदर पार के कभी गाने गाये तो सात समंदर पार के चक्कर लगाने का कुछ घंटों का खेल भी खेला।

जिसके लिये टेलीग्राम से संदेश भेजना शान थी, उसने ट्रंक कॉल, लाइटिनिंग कॉल, पीसीओ सेल पर दिन भर अपनों की शक्ल देख जी भर बातें की। जिसने २०० रुपये के मनीआर्डर के लिये चार घंटे लाइन लगाई और अब घर बैठे चार मिनट में लाखों ट्रांसफर कर लेता है।

जिसने महीनों लाइब्रेरी में किताब के लिये अर्जी दी, समाचार जानने के लिए बेचैनी से सुबह के अखबार का इंतजार किया और अब मोबाइल पर विश्व की घटी घटना कुछ पल में जान लेता है और लाइब्रेरी हाथ में लिये घूम लेता है।

कुछ उदाहरण मैंने बताये हैं। आप सोचकर देखिये। सो दो सौ ऐसी बातें मन को गुदगुदा जायेंगी सपने में भी नहीं सोची थी जैसी जिंदगी वह साकार हो सामने खड़ी है।

अपने गिरेबान में झांकिये, क्या आपने बदलाव नहीं लाया था? धोती छोड़ पेंट हमने शुरू की थी। लहंगे से साड़ी हमने पहनी थी। चूल्हे की रोटी से सिगड़ी, गैस और दाल दलना छोड़ बाजार से दाल हमने खरीदी थी।


जियो तो ऐसे जियो

ये क्या सोच रहे हैं हम?

हमने जो बदला वो विकास था, समय की मांग थी। पूरी जिंदगी हमने खूब मेहनत कर ली। अब ये जो वरिष्ठ होने का मेडल मिला है तो वरिष्ठता दिखानी है। नौकरी करने वाले को हर माह तनख्वाह मिलती है जिससे वो खींचतान कर जिम्मेदारी निभाता है पर साल में एक बार जो बोनस मिलता है उसकी वो पूरे साल आस लगाता है।

उससे वो अपने शौक और सपने पूरे करता है। जीवन का ये समय ईश्वर का दिया बोनस है। इस बोनस से मजा कीजिये। रोना छोड़िये, हमें जो परिस्थिति मिली हमने जी ली। अगली पीढ़ी को जो मिलेगी वो जी लेगी।

हमने अपनी परवरिश से उसे उस लायक बना दिया है। अब अपनी दौड़ उसे उसके ढंग से दौड़ने दें। हम तो खुशियों से मिले इन बचे सालों को जी भर जियें, जब तक हैं, और जब हम ही नहीं तो गम ही नहीं।

जीवन की आपाधापी में जो छूट गया अब उसे पकड़ें। जीवन बचे शौक पूरा करने के लिये बचा है। जी भर के जीयें। वर्तमान में जिये, भूत को याद करोगे तो डरोगे और जो भविष्य आया नहीं, उसकी सोच नहीं, नहीं नहीं।


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