शाक अर्थात् पत्ती वाली सब्जियाँ ये वैसे तो हमारे भोजन का एक हिस्सा हैं। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ ऐसी ‘‘शाक’’ हैं, जो विशिष्ट औषधि से कम नहीं हैं। आईये जानें ऐसी दुर्लभ विशिष्ट पत्र शाकों के बारे में जो हमारे लिये हैं, कुछ खास।
वास्तुक
इसको मराठी में चाकवत नाम से जाना जाता है और हिंदी में बथुआ अथवा चिल्लीशाक कहते हैं। इसी के वास्तूक, वास्तुक, क्षारपत्र अथवा शाकराट् यह पर्यायी हैं। बड़े पत्ते वाले और रक्तवर्णी वास्तुक को गौड वास्तुक कहते हैं। यह अधिकतर यव के खेत में उगता है।
अतः बथुआ को यवशाक भी कहते हैं। दोनों प्रकार के बथुए स्वादिष्ट, क्षारयुुक्त, कटु, विपाकी, अग्निदीपक, पाचक, रुचिकारक, लघु, शुक्र तथा बल को बढ़ाने वाले होते हैं।

यह सारक है तथा प्लीहा, रक्तपित्त, अर्श, कृमि तथा त्रिदोष की नाशक है। चरकाचार्य ने व्याधि चिकित्सा में अनेक स्थान पर वास्तुक का उपयोग बताया है। रक्तपित्त चिकित्सा में रुग्ण को विबन्ध रहने पर वास्तुक का उपयोग बताया है। इसी तरह आचार्य चरक ने अर्श, कास, अतिसार, उरुस्तंभ, वातरक्त, पुरीषक्षय में वास्तुक का उपयोग किया है।
सुश्रुताचार्य के अनुसार वास्तुक कटु, विपाकी, कृमिघ्न, मेधा, अग्नि और बल वर्धक है। इसमें क्षारों की उपस्थिति है। त्रिदोषघ्न है तथा रुचि उत्पन्न करने वाला तथा सर गुणात्मक है। क्षारों की उपस्थिति रहने से मूत्राश्मरी, वृक्कश्मरी जैसे विकारों में यह अपथ्य है।
क्षारों की उपस्थिति रहने से इसका आहार में उपयोग करते समय अम्ल वर्ग के द्रव्य जैसे अम्लिका (चिंचा), निम्बुक, वृक्षाम्ल के साथ पकाया जाता है। जिससे क्षार और अम्ल के संयोग से माधुर्य की उत्पत्ति होती है और शरीर पर हानिकारक परिणाम नहीं होते।
पोतकी
इसके गुणधर्म वास्तुक के समान ही होते हैं। इसको मराठी में ‘मायाळु’ नाम से जाना जाता है। हिंदी मेंं इसे पोई कहते है। यह शीत, स्निग्ध, कफकारक और वातपित्तघ्न है।
कण्ठ के लिए हितकारक नहीं है। यह पिच्छिल गुणात्मक है। निद्रा और शुक्रकारक तथा रक्तपित्तनाशक है। यह बलकारी, रुचि उत्पन्न करने वाली, पथ्य, बृंहण और तृप्तिकारक है।

सुश्रुत के अनुसार- विष से उत्पन्न, मद्य से उत्पन्न तथा शोणित विकार में वर्णित मद रोग का नाश करती है। साथ ही सर, स्निग्ध, बल्य, शीत, कफ उत्पन्न करने वाली, वात पित्तघ्न, वृष्य और मधुर रसविपाकी है। वाग्भटाचार्य ने भी मेदोघ्नी ऐसे वर्णन किया है।
चरक ने अर्श चिकित्सा में उपोदिक का उल्लेख किया है (च.चि. 14/126)। साथ ही चरक ने अतिसार में भी शूल युक्त अन्य शाक जैसे मूलक, वास्तुक आदि के साथ उपोदिका का उपयोग किया है।
(च.चि.19/33) पोतकी तैल का उपयोग भाव प्रकाश ने सुखप्रसव के लिए भी बताया है। पोतकी मूल कल्क में तिल तैल मिलाकर योनि के आभ्यंतर लेप करने से सुखपूर्वक प्रसव होता है।
मारिष
यह दो प्रकार का होता है। श्वेत मारिष और रक्त मारिष। इसे मराठी में माठ नाम से जाना जाता है।
‘‘मारिषो मधुरः शीतो विष्टम्भी पित्तनुद् गुरुः।’’
श्वेत मारिष

मधुर, शीत, विष्टम्भजनक, पित्तनाकश, गुरु गुणात्मक वातकफकारक एवं रक्तपित्त विषमाग्नि का शमन करने वाला है। रक्त मारिष किंचित गुरु, क्षारयुक्त, मधुर रस, कटु विपाकी, सारक कफजनक तथा स्वल्प दोष वाला होता है।
अष्टांग हृदय में वर्णन करते हुए कहा है, मारिष मधुर, रुक्ष, लवण युक्त, वात कफ कारक, गुरु, शीत, अधिक प्रमाण में मलमूत्र उत्पन्न करने वाला, विष्टम्भी होता है। इसका उपयोग करते समय, पकाते समय अधिक प्रमाण में स्नेह (तेल, घृत) का उपयोग करें। इस प्रकार पकाने पर यह अतिदोषकारक नहीं होता।
तण्डुलीय
इसे मराठी में काटे माठ और हिंदी मेंं चौलाई शाक के नाम से भी जाना जाता है। चौलाई लघु, शीत, रुक्ष, मूत्र तथा मल को अधिक मात्रा में निर्माण करने वाली, रुचिकारक, अग्निदीपक, पित्त, कफ, रक्त विकार तथा विष का नाश करने वाली है।

मधुर रसविपाकी, रुक्ष, पित्त तथा मद नाशक, तण्डुलीय शीततम अर्थात् अत्यंत शीत गुणात्मक है। यह विषनाशक भी है। पानीय तण्डुलीय यह एक तण्डुलीय की उपजाति है। यह तिक्त रसात्मक, लघु, रक्तपित्त तथा वात दोष नष्ट करता है।
चारकाचार्य ने रक्तपित्त चिकित्सा में तण्डुलीय का उपयोग बताया है। रक्तपित्त चिकित्सा में पथ्यकर शाक अच्छी तरह स्विन्न कर अथवा घृत में भर्जन कर यूष बनाकर सेवन कराऐं। इसमें तण्डुलीय यूष का उपयोग कर सकते हैं।
पालक्य

मराठी तथा हिंदी दोनों में ही यह पालक नाम से जाना जाता है। पालक वात कफकारक, शीत, मलभेदन करने वाला, गुरु गुणात्मक है। सुश्रुताचार्य के अनुसार यह बद्धविण्मूत्र अर्थात् मल एवं मूत्र को बांधने वाला है।
अन्यत्र इसे सर कहा गया है। परंतु यह आम मल तथा मूत्र को बद्ध करता है और पक्क मल का सरण करता है। राजनिघण्टु के अनुसार यह ग्राही और परं संतर्पण गुणयुमुक्त है।










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