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अभिवादन की जगह तिरस्कृत होते-वृद्ध

वरिष्ठजन अर्थात् वृद्ध वे हैं, जिनकी छत्र छाया में उनके स्नेह से सिंचित होते हुए हम बड़े हुए हैं। वास्तव में उनका हमारे जीवन में योगदान ही हमें उनके प्रति नतमस्तक कर देता है। लेकिन क्या वास्तव में वृद्धों की वर्तमान में वह सम्मानजनक स्थिति बची है? क्या हम उन्हें वह सम्मान दे रहे हैं?

कहा गया है-

‘अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपसेविन:
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलं’

वरिष्ठ यानि बड़े! क्या सचमुच हम उन्हें बड़ा मानते हैं? यदि हाँ! तो क्या हमारी दृष्टी में उनका यथोचित सम्मान है? यदि है! तो परिवारों में उनका तिरस्कार क्यों? उनकी बताई हुई मर्यादाओं का उल्लघंन क्यों? भला हमारे सुसंस्कृत समाज में वृद्धाश्रम नाम का महापराध क्यों? जिन माता पिता ने हमें यह शरीर प्रदान किया, हमारा उस अवस्था में पालन पोषण किया, जब यह शरीर अपने आप को स्वच्छ रखने में भी असमर्थ था। हमारी खुशियों और सुविधाओं हेतु अपने सुख का त्याग किया, हमारी अनेकों नालायकियों को सहन किया, अपनी सारी संपदा हमारे लिए दे दी, उनका उन्हीं के घर से निष्कासन! आखिर हम ने उन संतानों का समाज से बहिष्कार क्यूं नहीं किया? बल्कि उन्हें एक रास्ता दे दिया कि ठीक है भाई तुम बुजुर्गों के साथ नहीं रह सकते तो हम संभालेगें! तो एक परिपाटी ही चल पड़ी इस दुराचार की और समाज के सेठ लोग वृद्धाश्रम बनवाने में तन मन धन से सहयोग कर रहे हैं? हमारी मति कुमति कैसे बन गई?

बच्चे, जो अपने को भ्रमवश संस्कारी समझते हैं, वे कहते हैं कि हमारे तो मां बाप हमारे साथ रहते हैं जी! ये ध्यान ही नहीं आता कि हम हमारे माता पिता की शरण में रहते हैं! यही विकृति श्री गौमाताजी के संबंध में फैल गई है! बडे गर्व से कहते हैं कि हमने एक गाय गोद ले ली है जी! आप जगन्माता को गोद लोगे कि उन करुणामयी की अंक में शरण लोगे? इसी उपेक्षा का दुष्परिणाम घरों में भयंकर विवादों के रुप में दिखाई दे रहा है। क्या हमारे दादाजी के दादाजी हमारे लिए वरिष्ठ जन नहीं? क्या हम उनके बताये हुए नियमों को मानते हैं? यदि उन नियमों पर चलते तो क्या रोग घर में आ सकते थे? क्या अवसाद/झगड़ा/फसाद/तलाक/प्रोपर्टी विवाद/सुसाइड/पितृदोष/निर्धनता/कुसंस्कार आदि घर में प्रवेश कर पाते? कभी नहीं ना!

यदि आपको लगता है कि ऐसा नहीं है तो थोड़ा श्रम कीजिये और अपनी 5-7 पीढ़ियों पूर्व के जीवन पर दृष्टिपात कीजिये। वे सभी ‘बड़ा कहे ज्यूँ करणो, भीत में भाटो धरणो’ पर चलते थे। सुबह ब्रह्म मुहुर्त में उठना, सभी बडों के चरणों में वंदन करना, शरीर को श्रमित करना, अभ्यंग (मालिश), गंगा स्नान (5 बजे पूर्व का स्नान), तिलक धारण, संध्योपासन, श्रीहरि स्मरण, अपने वर्ण के अनुसार सेवा से आजीविका उपार्जन, गुरुजनों के सान्निध्य में अपनी संस्कृति के अनुसार विद्यार्जन, षोड़ष संस्कारों का यथा समय आचरण, समय से बालभोग, राजभोग, सायं संध्या पूर्व ब्यारू प्रसादम से निवृति, संध्या में नित्य सपरिवार सत्संग, जल्दी शयन आदि बड़ों द्वारा प्रदत्त विज्ञान का यथा रूप पालन करते। इससे उपरोक्त संकट सदैव दूर रहते और वर्ष में 365 दिन आनंद और उल्लास रहता था। सहज ही जीवन ‘पायो परम विश्राम’ की ओर अग्रसर हो जाता था। आओ अपनी भूल सुधारें? पुनः वही समस्या रहित एवं परमआनंद पूर्ण जीवन पायें। मेंरी तरह उस जीवन का अनुभव पाने हेतु नित्य संध्या में 6:50 बजे अपने घर से अपने ही मोबाइल से अपनी जिज्ञासा के समाधान हेतु टेलीग्राम पर ‘पालनहार सनातन OPD’ में पधारें।

(लेखक पालनहार सनातन फाउंडेशन के संचालक हैं।)

ललित किशोर जाजू


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