साक्षात ईश्वर का प्रतिरूप- पीपल

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भारतीय संस्कृति में पीपल को साक्षात सृष्टि के पालनहार लक्ष्मीनारायण का स्वरुप माना गया है। यही कारण है कि यह दीर्घायुष्य, सौभाग्य व समस्त सुख सम्पदा का कारण होकर कई पावन अवसरों पर पूजित होता है। जब भारतीय संस्कृति के हर धार्मिक तथ्य के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक आधार अवश्य ही है, तो आइये देखें क्यों इतना महत्वपूर्ण हैं पीपल?

पशु-पक्षियों एवं पेड़-पौधों के पर्यावरणीय महत्त्व को स्वीकार करते हुए हमारी संस्कृति में उनका सम्मान करने के लिये त्योहारों पर उनकी पूजा व अनुष्ठान तक किए जाते हैं। पीपल की पूजा वैसे तो वर्षभर की जाती है लेकिन होलिका दहन के दसवें दिन ‘दशा माता पर्व’ पर पीपल पूजन का विशेष कार्यक्रम तय है।

इसी क्रम में दो दिन पूर्व शीतला सप्तमी या अष्टमी का पूजन भी पीपल के नीचे बने स्थानक के ऊपर रखी खंडित मूर्तियों के पूजन से संपन्न होता है। दशा माता उस गृहदेवी को मानते हैं जो परिवार को सुदशा या सुख समृद्धि प्रदान करती है।

पीपल की छाया में व्रत-उपवास करके दशा माता का पूजन एक ओर जहाँ पीपल के जीवनदायी महत्त्व का सम्मान करना है, वहीँ जीवन में धार्मिक अनुशासन एवं मानवीय गुणों का विकास करना भी है। पेड़-पौधों का आदर एवं उनकी रक्षा का संकल्प लेना वास्तव में मनुष्य के लिये स्वयं की रक्षा की व्यवस्था करना ही है।

पीपल के पवित्र वृक्ष को धार्मिक, ऐतिहासिक या सार्वजानिक स्थलों पर ही रोपित किये जाने का विधान है। इसे घरों में लगाए जाने की मनाही हैं क्योंकि वैसा पवित्र वातावरण उसे घरों में नहीं मिल सकता हैं जैसी कि आवश्यकता होती है।


ऑक्सीजन का सतत प्रदाता

विशिष्ट भारतीय संस्कृति में पीपल वृक्ष को बहुत पवित्र एवं पूज्य माना जाता है। कहा गया है कि पीपल के वृक्ष में देवता निवास करते हैं। इसका अर्थ यह है कि पीपल में अनेक विशिष्ट गुण हैं। पीपल का वृक्ष चौबीसों घंटे प्राणवायु देकर वातावरण को शुद्ध एवं स्वास्थ्यप्रद बनाए रखने का कार्य करता है।

अतः यह गुण उसे स्वतः ही पूजनीय बना देता है। पीपल को भगवान शंकर के रूप में भी पूजा जाता है। इसका कारण यह है कि जिस प्रकार समुद्र मंथन से प्राप्त विष को भगवान शंकर ने पीकर पृथ्वी को बचाया उसी तरह पीपल का वृक्ष भी वातावरण से जहरीली गैसों को निरंतर पीते रहकर मानव जाति को चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देकर कल्याण करता है।

पीपल

यह एक प्रकार से ऑक्सीजन यंत्र है। अतः फेफड़ों, दमा व अस्थमा के रोगियों को इसकी छाया में बैठने से आरोग्य की प्राप्ति होती है। इसके संपर्क में रहने वाले व्यक्ति की आयु लम्बी एवं शरीर स्वस्थ रहता है।

यह सृष्टि का एकमात्र वृक्ष है, जो 24 घंटे ऑक्सीजन देता है। अन्यथा अन्य सभी वृक्ष तो केवल दिन में ही ऑक्सीजन देते हैं। रात्रि में तो सभी कार्बन डाई ऑक्साइड ही छोड़ते हैं।


जीवन के लिये सुकून के पल

इस वृक्ष की अनेक विशेषताओं में से एक यह है कि जान वायु बिल्कुल शांत हो तो तब भी इसके पत्ते हिलते रहते हैं। साथ ही इसके नीचे पानी के कणों का अहसास होता है जिसके कारण भीषण गर्मी में भी इसकी छाया में शीतलता का अनुभव होता है।

शांत हवा होने पर भी पत्तों के निरंतर हिलने और जल वाष्प के कारण छाया के शीतल रहने के बावजूद भी पीपल के पेड़ के नीचे कभी भी अँधेरा नहीं रहता। सूर्य की रश्मियां सहज ही इसके पत्तों को पार कर धरती पर आती रहती है और वातावरण को स्वच्छ बनाती रहती हैं।


बोधिवृक्ष के रूप में सम्मानित

पीपल का वृक्ष लम्बी आयु का वृक्ष है इसलिये इसे अति महत्वपूर्ण स्थानों पर रोपित करने की परंपरा रही है। भारतीय इतिहास में तो इसे हर युग में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह वृक्ष अपने नीचे बैठने वाले व्यक्ति को न केवल आरोग्य व बल प्रदान करता है, वरन उसे विवेकशील, ज्ञानवान व योगी के गुण भी प्रदान करता है, फलस्वरूप उसे सत्य का बोध हो जाता है।

बोधत्व प्रदान करने के इस गुण के कारण ही इसे बोधिवृक्ष के रूप में पूजा जाता है। बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति से लेकर अशोक की पुत्री संघमित्रा का बोधिवृक्ष की डाल लेकर धर्मदूत की मैत्री यात्रा के उद्देश्य से श्रीलंका जाना विश्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखी घटना है।

बौद्धकाल में राजमार्गों, धार्मिक स्थलों के आसपास व कुओं के निकट पीपल के वृक्ष लगाने की ही परंपरा थी, जिसके कारण यात्रियों को विश्राम के लिये उत्तम छाया एवं शुद्ध जल की प्राप्ति होती थी।


कई रोगों की रामबाण औषधि

पीपल

पीपल के वृक्ष की जड़, टहनियां, पत्ते, फल, छाल, गोंद तथा रस व रेशे आदि सभी अंग मनुष्य को निरोगी बनाने में सहायता करते हैं।

आयुर्वेद ग्रंथों में इसके चिकित्सीय गुणों को विस्तार से वर्णित किया गया है तथा चिकित्सा शास्त्री मानव को नया जीवन एवं शक्ति देने वाली श्रेष्ठ औषधियां पीपल के अंगों से तैयार करते हैं, साथ ही साधारण लोग भी इसकी अनेक विशेषताओं से परिचित हैं तथा घरेलु ढंग से कई रोगों के उपचार में पीपल के विभिन्न अंगों का प्रयोग करते हैं।

गाँवों के वनों में पीपल के वृक्ष इसलिये ज्यादा लगाए जाते हैं ताकि वहां का वातावरण स्वास्थ्यप्रद बना रहे। पीपल की छाल पीलिया रोग दूर करती है।


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