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‘समुन्द्र मंथन’ की तरह करें आत्ममंथन

महेश नवमी के पावन पर्व को हम सभी समाजवासी उत्साहित हो धूमधाम से मनाते हैं किंतु केवल उत्सवपूर्ति को भव्य रुप देने से हमारे दायित्वों की इतिश्री नहीं होती। उत्सव के साथ ही हमें आत्मचिंतन कर अपने भीतर कुछ सकारात्मक बदलाव लाने होंगे तभी सही मायने में हम इसे सार्थक समझेंगे। भगवान महेश ने हमें त्याग, समर्पण, सेवा और ना जाने कितने ही बहुमूल्य संदेश दिये हैं जिनका अंश मात्र अनुसरण करने का प्रयास भी हम करते हैं तो जीवन जीने की राह आसान और खुशनुमा हो जायेगी। आज हर मानव जो विषम स्थितियों के दौर में अनेक त्रासदियों से गुजर रहा हैं, वह त्रासदियां भी कुछ मात्रा में ही सही निश्चित रुप में कम हो जायेगी। इसके लिये पौराणिक समुद्र मंथन की तरह आत्ममंथन जरूरी है।

समुद्र मंथन के दौरान भगवान विष्णु ने कच्छप बनकर मंथन में भाग लिया था। समुद्र के बीच वे स्थिर थे, उनके उपर मंदरांचल पर्वत स्थापित कर वासुकी नाग को रस्सी बनाकर देवता और दैत्यों ने मिल मंथन करना प्रारंभ किया तो चौदह रत्नों में सर्वप्रथम जल द्वारा हलाहल उपर आया जिसकी प्रखर ज्वाला से सभी देवताओं और दैत्यों को जलन होने लगी।

प्रायः हम देखते हैं, जब भी कोई वस्तु बॉंटी जाती है अथवा मिलती है तो हम सर्वश्रेष्ठ हमें मिले इसी जहोजहद में लगे रहते है। इस से विपरीत भगवान महेश ने तत्काल उदारता धारण कर मंथन के दौरान निकला हुआ हलाहल हथेली में रख स्वयं प्राशन किया।

उस विष को ना निगला ना उगला निगलते तो स्वयं को हानि और उगलते तो सर्वनाश निश्चित था। सर्वनाश की स्थिति उत्पन्न ना हो इसलिए शिव जी ने विष को कंठ में धारण किया।


नकारात्मकता से न खोऐं संयम

प्रायः नकारात्मकता के चलते हम संयम खो देते है और अपनी वाणी से कई बार विष रुपी कटु वचन उगल देते हैं या उसे अपने भीतर रख मन ही मन हम कुढ़ते रहते हैं और स्वास्थ्य को हानि पहुँचाते है। मन में द्वेष, ईर्ष्या का पौधा वटवृक्ष का रुप ले लेता हैं।

वास्तविकता से हम भलीभॉंति परिचित है, किसी के दिल को ठेस पहुँचाते समय दूसरों के साथ ही हम स्वयं भी आहत होते हैं। इसमें कई बार पारिवारिक, सामाजिक, व्यवसायिक संबंधों की आहुति देनी पड़ती है जिसके चलते तनाव की जो स्थितियां हम स्वयं निर्मित करते है, वह अनेक बीमारियों को न्यौता तो देती ही है साथ ही हमें अवसाद के कटघरे में लाकर खड़ा कर देती है और पश्चाताप की अग्नि में जलने के सिवा कोई पर्याय हमें नजर नहीं आता।

भौतिक माया यह मृग मरीचिका का मायावी जाल है जो हमें कितना ही आकर्षित क्यों ना करे, इसे पाने के लिए हम कितने ही रुख़ अपनायें किंतु इस से मिलने वाला सुख स्थाई नहीं है। विधि का विधान निश्चित है और काल जब हमें अपने आगोश में समाहित करेगा तो केवल कर्मफल ही साथ होंगे।


श्रेष्ठ कर्मों का मिलता है फल

श्रेष्ठ कर्मों का फल बीमा पॉलिसी की तरह जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी हमें लाभान्वित ही करता है। तो क्यों ना इस महेश नवमी के पावन पर्व पर हम सभी समाज वासी मन में दृढ़ निश्चय कर प्रण लेवें ‘छोटी छोटी बातों में तिल का ताड़ बनाने की अपनी मनोवृत्ति पर विराम लगायेंगे।’ प्रत्येक व्यक्ति में गुण दोष विद्यमान होते हैं, बस जरुरत है, आपसी रिश्तों में थोडा सा तालमेल बैठाकर चलने की।

जीवन में आये कुछ कड़वे अनुभव व प्रसंग नजरअंदाज कर चलेंगे तो जीवन यात्रा का आंनद ले पाएंगे वरना बोझिल कदमों से राह कष्टदायक होगी। नम्रता का आभुषण सर्वोत्तम है इसे पहन लिया जाए तो कुछ समस्याओं पर खुद बखुद विराम लग जाएगा। अपनी वाणी में मिश्री सी मिठास घोलकर कही गई बात निश्चित तौर पर सकारात्मक और प्रभावी होगी तो क्यों ना हम भी उदारता का परिचय देते हुए जीवन यापन करने की आदत डालें, जिससे हमें आत्मिक संतुष्टि के साथ ही स्वास्थ्य लाभ होगा।

भगवान महेश जब विष प्राशन कर रहे थे तो कुछ बुंदें नीचे गिर गई। आज सॉंप – बिच्छू उसी का रुप हैं। उसी तरह हम जरा भी कटु वचनों को अपने जीवन में शामिल कर चलेंगे तो हमारे अपने भी हमसे दूरियां बना लेंगे।

तो आओ इस वर्ष महेश नवमी का पावन पर्व उत्साहित हो मनाते हैं। बाह्य उत्सव तो निश्चित ही कोरोना के अनुकूल होगा किंतु शांति का एक दीप अपने भीतर प्रज्वलित कर आंतरिक मन को रोशन करते हैं।