योग सिद्धि के दो सोपान- यम-नियम

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वैसे तो वर्तमान में भी योग की सम्पूर्ण विश्व में पताका फहर रही है लेकिन हमारे मनीषियों ने इसे इससे भी आगे सिद्धि बना दिया था। वास्तव में योग सिर्फ तन की स्वस्थता का साधन नहीं बल्कि यह तो सर्वांग सिद्धि का माध्यम है। बस इसकी सिद्धि के लिये जरूरी हैं इसके प्रमुख सोपान यम-नियम ।

भारतीय धर्म-संस्कृति की आधारशिला सत्य, सदाचार, साहचर्य, समन्वय, सर्वआरोग्य, सर्वबंधुत्व और सर्वकल्याण जैसे जिन उद्दात्त मूल्यों पर रखी है, वे सब जिस एक में निहित हैं उसका नाम योग है। योग अपने आप में एक धर्म है, जो काल की चतुर्युगीन भारतीय परिकल्पना में सतयुग में प्रचलित था और कालजयी होकर आज कलयुग तक अपने अनुयायियों द्वारा पालित है।

यह भी कहा जा सकता है भारतीय संस्कृति योग-संस्कृति है और सनातन धर्म योग-धर्म ही है। वह अनूठा धर्म-पंथ जिसके अनुयायियों का अंतिम लक्ष्य योगस्थ योगेश्वर परमात्मा को पाना है और जिसका साधन एकमात्र ‘योग’ है।

हमारे शास्त्र कहते हैं सतयुग में केवल योग ही धर्म था। अर्थात् लोगों का स्वभाव और कर्तव्य केवल योग था। उनमें काम, क्रोध, लोभ आदि दुर्गुण न थे, अतः वे सर्वोत्तम योगधर्म का आश्रय लेकर सरल, सहज, स्वाभाविक जीवन जीते और दीर्घायु होते थे।

इसका यह आशय कदापि नहीं है कि वे लोग दिनभर योगाभ्यास ही करते रहते थे और बाकी कोई कामधाम नहीं करते थे। बल्कि यह है कि योगासनों के इतर और ऊपर उन्होंने योग को गहरे से आत्मसात कर लिया था। योग उनकी जीवन शैली था इसी कारण वे स्थित प्रज्ञ और नि:स्पृह रहकर कामना रहित निश्छल निर्मल जीवन जी पाते थे।

वे व्यावहारिक जीवन के लिए जरूरी खान-पान, विवाह-परिवार सारे दायित्वों का निर्वहन तो करते थे मगर ‘योग’ सध जाने के कारण तत्कालीन समाज छल, कपट, प्रपंच और प्रतिस्पर्धा से परे हो गया था। सबमें सत्त्व अधिकतम होता था, इसीलिए उनका युग सतयुग था।


सतयुग और उसके धर्म से जुड़ी योग केंद्रित यह अवधारणा संकेत करती है कि केवल योगासनों के अभ्यास मात्र से ‘योग’ की सिद्धि सम्भव नहीं है। योगासन सिद्धि में सहायक अवश्य है मगर सच्ची सिद्धि योग को उसकी सम्पूर्णता में अपनाने से ही सम्भव है।

अन्यथा योगासनों से शारीरिक स्वास्थ्य और कुछ हद तक मानसिक सुकून अवश्य पाया जा सकता है लेकिन जिस परम् सिद्धि के लिए ‘योग’ है, उसकी प्राप्ति तभी सम्भव है जब योग जीवन शैली बन जाए।

ध्यान रहे योग महर्षि पतंजलि से भी सदियों पूर्व से है। महर्षि पतंजलि योग के प्रणेता के रूप में लोक विख्यात इसलिए हुए कि उन्होंने योग शास्त्र के बिखरे हुए सूत्रों को एकत्र कर उसे समग्रता में प्रस्तुत करने का महत् कार्य कर योग को लोक के लिए सुबोध बना दिया।

आज विश्वभर में योग का जो भी वैभव है वह सब महर्षि पतंजलि द्वारा सम्पादित 196 पंक्तियों के ‘योगसूत्र’ पर आधारित है। ख़ास बात यह कि योग की ‘सिद्धि’ के लिए पतंजलि जिन आठ सोपानों यानी अष्टांग योग का प्रतिपादन करते हैं, उनमें भी ‘आसन’ तीसरे क्रम पर है।

उससे पहले यम-नियम रूपी दो सीढ़ियाँ और हैं। मानो पतंजलि इशारा करते हैं कि आसन तक जाने से पहले यम व नियम की कसौटी पर ख़रा उतरना ज़रूरी है।


यम-नियम वस्तुतः शील और तपस्या के द्योतक हैं। यम का अर्थ है संयम है जिसके लिए पतंजलि का सूत्र है, ‘अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्या परग्रहा:यमा: ।।’ इसमें पाँच सामाजिक नैतिकता अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह साधने की सीख है। अस्तेय अर्थात् दूसरों की वस्तु की चोरी न करना और अपरिग्रह अर्थात् वस्तुओं के संग्रह से बचना। जीव मात्र के प्रति अहिंसा और एकमात्र परमात्मा को सत्य मानना था ब्रह्म की भाँति चर्या रखना ही यम साधना है।

इसी तरह नियम को समझाते हुए पतञ्जलि ने सूत्र दिया है, ‘शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा:।।’ अर्थात् शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान करना ही नियम हैं। जिस प्रकार यम के पाँच अनुशासन सामाजिक नैतिकता सिखाते हैं, उसी प्रकार नियम मनुष्य की व्यक्तिगत नैतिकता को अनुशासित करने के लिए है।

यम-नियम

आसन तो इसके बाद तीसरे क्रम पर है। यानी क़ायदे से आसनों के अभ्यास का अधिकारी वही है जो अपने जीवन में यम-नियम के सूत्रों को साध चुका हो। इसके बाद चौथे क्रम पर प्राणायाम और फिर क्रमशः प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि है।

महत्वपूर्ण है कि अष्टांग योग के अंतर्गत प्रथम पांच अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार) ‘बहिरंग’ और शेष तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) ‘अंतरंग’ नाम से प्रसिद्ध हैं। बहिरंग साधना यथार्थ रूप से अनुष्ठित होने पर ही साधक को अंतरंग साधना का अधिकार प्राप्त होता है।

इस तरह सीढ़ी दर सीढ़ी ही आगे बढ़ा जा सकता है, किसी एक सीढ़ी को छोड़कर अगली पर छलाँग नहीं मारी जा सकती।


साधो! आजकल योग एक ‘फैशन’ है। बहुसंख्यक योग प्रेमियों को योगासन करते देखना सुखद है पर याद रखिए शास्त्र के अनुसार यम-नियम को साधे बिना योगाभ्यास ‘अधूरा’ है। यदि जीवन में यम व नियम के सभी दस सद्गुणों का उजाला उतर आए तो कदाचित योगासनों के अभ्यास की आवश्यकता न रहे।

जब अनेक योगाभ्यासियों को यम-नियम की कसौटी पर कमजोर पाकर बड़े जोर शोर से आसन करते देखता हूँ उद्विग्न हो जाता हूँ। वे आसन में भले निष्णात हो जाए मगर उनके जीवन में योग कभी उतर नहीं पाता।

वे मानो कागज की नाव पर संसार सागर पार करने निकले यात्रियों जैसे नज़र आते हैं। सम्भव है वे डूबे नहीं मगर उस पार परमात्मा तक कभी नहीं पहुँच पाते!

डॉ. विवेक चौरसिया, उज्जैन


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