स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा- जियोपैथिक स्ट्रेस

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वर्ष 1992 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने खोज की कि एक निर्मित इमारत भी किसी व्यक्ति को बीमार कर सकती है। वास्तव में इसका कारण होती है, जियोपैथिक स्ट्रेस अर्थात पृथ्वी की सतह से उत्सर्जित ऊर्जा, जिसमें मानव के सामान्य कामकाज को बदलने की क्षमता होती है, उसे जियोपैथिक स्ट्रेस कहा जाता है। जियोपैथिक स्ट्रेस (जीएस) पृथ्वी की सतह की वह ऊर्जा है, जो निर्मित पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा है।


निर्मित पर्यावरण घरों, सड़कों, फुटपाथों, दुकानों आदि का निर्माण करता है, जबकि जियोपैथिक स्ट्रेस निर्मित पर्यावरण के प्रत्येक भाग को प्रभावित करता है। यह ऊर्जा धातुओं, ठोस व अन्य पदार्थों में प्रवेश करती है, जिसमें उच्च स्तर की अभेद्यता होती है। विभिन्न तरीके हैं जिनके द्वारा इस भू-तनाव का पता लगा सकते हैं।

जियोपैथिक स्ट्रेस

शोध से अब यह अच्छी तरह से साबित हो गया है कि जियोपैथिक स्ट्रेस निर्मित वातावरण को प्रभावित करता है। जैसे अगर लोग तनाव वाले क्षेत्रों में सोते हैं, तो ऐसे क्षेत्र कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के लिए अतिसंवेदनशील होते हैं। दूसरी ओर, अगर भू-पर्यावरणीय तनाव सड़क के वातावरण पर मौजूद है, तो ऐसे क्षेत्र दुर्घटनाओं के लिऐ जिम्मेदार चालकों की क्रिया-प्रतिक्रिया के समय को बढ़ा सकते हैं।

जियोपैथिक स्ट्रेस वाले क्षेत्र में पेड़ की उपस्थिति से भी कैंसर हो सकता है। भू-वैज्ञानिक रूप से तनाव वाले क्षेत्रों पर बिजली गिरने की संभावना अधिक होती है। जियोपैथिक स्ट्रेस की स्थिति में कांक्रीट रोड खराब हो सकती है या उससे क्रेक विकसित हो सकते हैं। अतः इस तरह निर्मित पर्यावरण के लिये जियोपैथिक स्ट्रेस महत्वपूर्ण खतरों में से एक है।


निर्मित पर्यावरण पर प्रभाव

निर्माण पूर्व की गतिविधियों में पहले ‘भूमि परीक्षण’ को अभिन्न अंग माना जाता था, लेकिन आज कल यह देखा गया है कि ऐसा करना आमतौर पर उपेक्षित हो गया है। शोधपूर्ण अनुसंधान से पता चलता है कि जियोपैथिक स्ट्रेस निर्मित पर्यावरण के लगभग हर हिस्से को प्रभावित करता है। बदलती जलवायु के साथ-साथ प्राकृतिक वातावरण मनुष्य की जीवन शैली के लिए उपयुक्त नहीं है, या व्यक्ति जानवर पर्यावरण के साथ समयोजन करके जी लेते हैं।

मनुष्य प्राकृतिक परिवेश में उपयुक्त परिवर्तन की कोशिश कर रहा है। ऐसे रुपांतरित पर्यावरण को ‘निर्मित पर्यावरण’ के रूप में जाना जाता है। कुछ स्थानों पर पृथ्वी से ऊर्जा जो मानव शरीर प्रणालियों के सामान्य कामकाज को परेशान करने की क्षमता रखती हैं, उन्हें ‘जियोपैथिक स्ट्रेस’ के रूप में जाना जाता है, क्योंकि लोग निर्मित पर्यावरण वाले कुछ स्थानों में होने वाली घटनाओं से अनजान होते हैं। भू-जल की उपस्थिति जियोपैथिक स्ट्रेस के साथ निकटता से जुड़ी हुई है।


भूमिगत जल धारा है आम वजह

जियोपैथिक स्ट्रेस का सबसे सामान्य कारण एक भूमिगत जल धारा है। जब पानी चट्टानों से बहता है, तो यह कुछ विद्युत चुुंबकीय क्षेत्र को जन्म देता है। यह क्षमता उसके यांत्रिक घर्षण के कारण उपसतह में उत्पन्न होती है, क्योंकि यह फिशर्स, दोषों, जोड़ों और वंश आदि के माध्यम से बहती है (गेल्डार्ट, 1976, मरिसन, 2004)।

जियोपैथिक स्ट्रेस

यह विद्युत चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी की सतह और इसके ऊपर से 220 किमी (रॉल्फ, 2005) की दूरी तक एक ऊर्ध्वाधर मैदान में उगता है। उन्हें दोपहर, मध्य-गर्मियों, पूर्णिमा और अधिक समय तक बढ़े हुए सौर चमक (सनस्पॉट) गतिविधि के दौरान मजबूत होने के लिए जाना जाता है।

जमी हुई सर्दियों के दौरान उन्हें कनाडा के टुंड्रा में निष्क्रिय कर दिया गया है। उन्हें उच्च स्तर के आयनीकरण विकिरण के साथ और बिजली के हमलों व अन्य वायुमंडलीय घटनाओं के लिये भी जाना जाता है। भू-गर्भीय तनाव एक भूगर्भीय दोष रेखा से भी उत्पन्न हो सकता है।

अर्थात् आधारशिला में एक गहरी दरार जो पृथ्वी के भीतर गहरे विकिरण को सतह तक आने देती है। जियोपैथिक स्ट्रेस जोन की ओर जाने वाले अन्य कारक हैं-लेई लाइन, ग्लोबल जियोमैग्नेटिक ग्रिड क्रॉसिंग, अंडरग्राउंड कैवर्न्स और नैचुरल कॉर्डिनेशन।

लेखिका निमिषा विरल दामानी मुंबई के प्रसिद्ध वास्तुशास्त्री के.सी.आर. तोषनीवाल की बेटी है। विगत दो वर्षो से जियोपैथिक स्ट्रेस सलाहकार के रूप में कार्य कर रही है। विगत दो वर्षो में 40 से अधिक शहरों में अपनी सेवाएं दे चुकी है।


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