एक दूसरे को प्रेम व अपनत्व के रंग में रंगकर जीवन में कटुता को समाप्त कर मधुरता की मिठास पैदा करने वाला होलिकोत्सव कितना पुराना पर्व है, इसका आप अनुमान भी नहीं लगा सकते। हमारे आदि धर्मग्रंथों वेदों से लेकर पुराणों तक में इस उत्सव को मनाने का उल्लेख मिलता है। आइये जाने होली उत्सव से जुड़े कुछ पौराणिक तथ्य।
होली एक राष्ट्रीय, सामाजिक व धार्मिक त्यौहार माना जाता है। यह बच्चे, बड़े, नर-नारी सभी के द्वारा सभी जातिभेद भूलकर, द्वेषभाव भुलाकर प्रेम व भाईचारे से मनाने का पर्व है। यह मित्रता व एकता का व आनंदोल्लास, सदमिलन, सद्भावना का प्रतीक है। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सम्पूर्ण भारत वर्ष में होलिका दहन का विधान होता है।
वास्तव में यह एक वैदिक महायज्ञ है। होली त्यौहार के आरंभ का ज्ञात हो पाना बड़ा ही कठिन है किन्तु, वेदों व पुराणों में उल्लेख आता है इसलिए यह वैदिक कालीन पर्व माना जाता है। वैदिक काल में इसे ‘नवान्नेष्टि यज्ञ’ पर्व भी कहा जाता था।

इस हवन में खेतों की फसल का नया अन्न यज्ञ में हवन करके प्रसाद लेने की परंपरा भी है। उस अन्न को ‘होला’ कहते हैं। इसी से पर्व का नाम होलिकोत्सव पड़ा।
भविष्यपुराण में भी उल्लेख
भविष्य पुराण में महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- ‘भगवान, फाल्गुन पूर्णिमा को उत्सव क्यों मनाया जाता है?’ तो उन्होंने बताया- सतयुग में एक दानवीर, शूरवीर-सर्वगुणसम्पन्न रघु नामक राजा थे। एक दिन नगर के लोग राजद्वार पर एकत्रित होकर ‘त्राहि-त्राहि’ पुकारने लगे। पूछने पर बताया कि, ‘ठोठा’ नामक एक राक्षसनी प्रतिदिन हमारे बालकों को कष्ट देती है हुए उस पर किसी मंत्र-तंत्र, औषधि आदि का प्रभाव भी नहीं पड़ता।
यह सुनकर राजा ने राज पुरोहित महर्षि वरिष्ठ मुनि से उस राक्षसनी के विषय में पूछा। तब वरिष्ठ मुनि ने राजन से कहा-माली नामक एक दैत्य है, उसकी एक पुत्री है, जिसका नाम है ठोठा। उसने उग्र तपस्या करके शिवजी को प्रसन्न कर वरदान लिया है कि देवता, दैत्य, मनुष्य आदि मुझे मार न सके और शस्त्र-अस्त्र से भी मेरा वध न हो। शीतकाल, उष्णकाल व वर्षाकाल में, भीतर अथवा बाहर कहीं पर भी मुझे किसी का भय ना हो।

इन्होंने बताया कि केवल ‘अडाड’ मंत्र के उच्चारण से ही वह शांत हो सकती है। और इससे पीछा छुड़ाने का उपाय भी वरिष्ठ मुनि ने बताया कि फाल्गुन मास की पूर्णिमा को सभी निडर होकर, नाच-गा कर उत्सव मनाएं और बालक लकड़ियों की बनी हुई तलवार लेकर युद्ध के लिए दौड़ें और उत्सव मनाएं।
सूखी लकड़ी, सूखे उपले, सूखे पत्ते, अधिक से अधिक ढेर लगाएं। उस ढेर को रक्षोघ्न मंत्र से अग्नि लगाकर हवन करें। इस प्रकार रक्षा मंत्रों से हवन करने से उस दुष्ट राक्षसी का निवारण हो सकेगा। जब राज्य में ऐसा उत्सव मनाया गया तो इससे उस राक्षसी का विनाश हुआ। तबसे इस लोक में ठोठा का उत्सव प्रसिद्ध हुआ।
कई मान्यताएं भी जुड़ी
ब्राह्मणों द्वारा सभी दुष्टों तथा रोगों को शांत करने का वसोर्धारा होम भी इसी दिन किया जाता है। इसलिए इसे होलिका भी कहा जाता है। एक मान्यता ऐसी भी है कि इस पर्व का संबंध ‘काम दहन’ से है। भगवान शिवजी ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से इस त्यौहार का प्रचलन हुआ। यह त्यौहार हिरण्यकश्यप की बहन होलिका और पुत्र प्रह्लाद की स्मृति में भी मनाया जाता है।
कहा जाता है, हिरण्यकश्यप की बहन राक्षसनी होलिका वरदान के प्रभाव से नित्य अग्निस्नान किया करती थी और जलती नहीं थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद विष्णुभक्त था। हिरण्यकश्यप ने उसे मारने के लिये कई उपाय किये परन्तु प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसलिए अपने पुत्र प्रह्लाद को अपनी बहन की गोद में देकर अग्निस्नान करने को कहा।

जिस दिन होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्निस्नान करने वाली थी, उसी दिन गाँव के सभी लोगों ने अग्नि प्रज्जवलित करके अग्निदेव से प्रह्लाद की रक्षा के लिये प्रार्थना की। अग्नि देवता ने प्रार्थना स्वीकार करके होलिका के अग्निस्नान के समय प्रह्लाद को तो बचा लिया और होलिका उस अग्नि में भस्म हो गई।
अतः फाल्गुन पूर्णिमा को भक्त प्रह्लाद की स्मृति में और असुरों के विनाश की खुशी में यह पर्व मनाया जाता है।










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