लोगों को यह भ्रम है कि लक्ष्मी अर्थात धन केवल परिश्रम, पराक्रम या प्रारब्ध से प्राप्त होता है। सच तो यह है कि जो शीलवान होते हैं वे ही लक्ष्मीवान बन पाते हैं। यदि लक्ष्मी पाकर भी शील न रहे तो आई हुई लक्ष्मी भी लौट जाती है।
शास्त्र कहते हैं मन, वाणी और कर्म से जो किसी का अहित नहीं करता, सब पर दया करता है और यथाशक्ति दान देता है, वहीं शीलवान कहलाता है। लक्ष्मी ऐसे ही शील सम्पन्न मनुष्यों के यहाँ निवास करना पसंद करती है। महाभारत के शांतिपर्व में इसका मर्म बताती अद्भुत कथा है जो 124 वें अध्याय में दर्ज़ है।
जिसके अनुसार प्राचीन समय में शील का ही आश्रय लेकर दैत्यराज प्रह्लाद ने देवराज इंद्र तक को अपने अधीन कर लिया था। तब परेशान इन्द्र देवगुरु बृहस्पति के पास पहुँचे और अपने कल्याण का उपाय पूछा। देवगुरु ने उन्हें इसे जानने के लिए दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास भेजा और शुक्राचार्य ने प्रह्लाद के पास जाने की सलाह दी।
इन्द्र ब्राह्मण का वेष बनाकर अपने कल्याण का मार्ग जानने प्रह्लाद की सेवा में उपस्थित हुए। प्रह्लाद ने कहा कि ‘मैं क्रोध को जीतकर मन और इंद्रियों को काबू में रखता हूँ। इसी आचरण से मैंने अपना शील साधा है।
जैसे मधुमक्खियाँ शहद के छत्ते को फूलों के रस से सींचती रहती हैं उसी प्रकार सन्मार्ग का उपदेश देने वाले ब्राह्मण अर्थात गुणी ज्ञानी लोग शास्त्र के अमृतमय वचनों से मुझे सींचा करते हैं। जो इसी प्रकार ज्ञानियों का सत्संग कर सद्कर्म करता है वह कोई भी हो, मेरी तरह त्रिलोकी का राजा बन सकता है।

‘तब ब्राह्मण रूपी इन्द्र की विनम्रता से प्रसन्न प्रह्लाद ने उनसे कोई वरदान मांगने को कहा। इन्द्र इस समय तक जान चुके थे कि शील ही सबसे बड़ी सम्पत्ति और शक्ति है। तो चतुर देवराज ने माँगा, ‘मुझे आपका शील ही प्राप्त करने की इच्छा है, यही मेरा वर है।’ प्रह्लाद ने स्वयं वर माँगने को कहा था और अपने स्वभाव की सरलता में वे इन्द्र को पहचान न पाए थे, अतः कहीं ब्राह्मण नाराज़ न हो जाए, इसका विचार कर उन्हें अपना शील इन्द्र को देना पड़ा।
इधर इन्द्र शील लेकर लौटे और उधर कुछ ही समय बाद प्रह्लाद के शरीर से एक परम कांतिमय तेज मूर्तिमान होकर प्रकट हुआ। जिसने प्रह्लाद के शरीर को त्याग दिया था। प्रह्लाद ने उससे पूछा ‘आप कौन हैं’ तो उसने उत्तर दिया ‘मैं शील हूँ। तुमने मुझे त्याग दिया है, इसलिए मैं जा रहा हूँ।
अब मैं उस ब्राह्मण के शरीर में निवास करूँगा जो अभी-अभी यहाँ से गया है।’ इतना कहकर शील अदृश्य हो गया और इन्द्र में समा गया।इसके बाद क्रमशः धर्म, सत्य, सदाचार और बल भी प्रकट हुए और एक-एक कर प्रह्लाद को त्याग इन्द्र के शरीर में प्रवेश कर गए।
इसलिए कि जहाँ शील होता है वहाँ धर्म रहता है। जिसके पास धर्म रहता है वहीं सत्य रहता है। सत्य हो तभी सदाचार रहता है और सदाचार हो तभी बल टिकता है। जब सदाचार का अनुगामी बल भी प्रह्लाद को त्यागकर चला गया तब अंत में एक प्रभामयी देवी प्रकट हुई जो लक्ष्मी थी।
प्रह्लाद ने उनके जाने का कारण पूछा तो देवी बोली ‘दैत्यराज ! मैं बल की अनुगामिनी हूँ। मैं तुम्हारे यहाँ निवास करती थी लेकिन तुमने शील क्या त्यागा, सब तुम्हें त्यागकर चले गए। अतः मैं भी जा रही हूँ। क्योंकि जिसके पास शील है, मेरा निवास भी वहीं है।
ऐसा कहकर लक्ष्मी भी इन्द्र के पास चली आई। जाने की बेला देवी लक्ष्मी ने सुंदर वचन कहे जो हम सबके लिए लक्ष्मी पाने का मानो महामंत्र है। यह कि ‘धर्म: सत्यं तथा वृत्तं बलं तथाप्यहम्। शीलमूला महाप्राज्ञ सदा नास्त्यत्र संशय:।।’
अर्थात हे महाप्राज्ञ! धर्म, सत्य, सदाचार, बल और मैं लक्ष्मी, हम सभी सदा शीलवान के पास ही रहते हैं। शील ही इन सबकी जड़ है, इसमें कोई संशय नहीं है। जिसके पास शील है, लक्ष्मी उसी को मिलती और उसी के पास टिकती है।














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