Save 20% off! Join our newsletter and get 20% off right away!
mahabharat

नव संवत्सर अर्थात हम ऊँचे उठे!

महाभारत में नव संवत्सर से जुड़ी एक सुंदर कथा आदिपर्व में है। एक बार पौरवनन्दन राजा वसु अस्त्रों-शस्त्रों का त्याग कर आश्रम में रहने चले गए। उन्होंने बड़ा भारी तप किया और तपोनिधि माने गए। तब देवराज इंद्र राजा के पास पहुंचे और आग्रहपूर्वक उन्हें तपस्या से निवृत्त करा दिया।

देवराज ने कहा ‘पृथ्वीपते! तुम्हें ऐसी चेष्टा करनी चाहिए जिससे इस धरती पर वर्णसंकरता न फैले। तुम राजा बनकर प्रजा की रक्षा करो। यही तुम्हारा कर्तव्य है। अतः तुम्हें तपस्या न करके इस वसुधा का संरक्षण करना चाहिए। हे राजन! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित धर्म ही संपूर्ण जगत को धारण करेगा।’

इस तरह धरती पर अराजकता न फैले और धर्म का राज स्थापित रहे, इसी उद्देश्य से इंद्र व देवताओं ने राजा वसु को तपस्या से विरत करा दिया। कथा कहती है इंद्र ने उन्हें अपना सखा घोषित किया और धरती पर सर्वोत्तम चेदी देश का भरापूरा राज्य उपहार दे दिया।

इंद्र ने राजा को एक वैजयंतीमाला दी जिसके कमल कभी कुम्हलाते नहीं थे। इंद्र ने कहा था, ‘वसु! इसे धारण कर लेने पर भीषण संग्राम में भी तुम्हें आघात नहीं लगेंगे। यह इंद्रमाला के नाम से जगत में तुम्हारी पहचान कराने के लिए परम धन एवं अनुपम चिन्ह होगी।’

साथ ही इंद्र ने राजा वसु को बांस की एक छड़ी भी दी। जो सज्जनों की रक्षा करने वाली थी। एक वर्ष बीतने पर भूपाल वसु ने इंद्र की पूजा के लिए उस छड़ी को भूमि में गाड़ दिया। महाभारत कहती है तब से लेकर आज तक श्रेष्ठ राजाओं द्वारा छड़ी धरती में गाड़ी जाती है। वसु ने जो प्रथा चलाई वह आज भी चल रही है।

दूसरे दिन अर्थात नवीन संवत्सर के पहले दिन प्रतिपदा को वह छड़ी वहां से निकाल कर बहुत ऊंचे स्थान में रखी जाती है। फिर रेशमी वस्त्र, चंदन, माला और आभूषणों से श्रंगार कर उसी छड़ी पर देवेश्वर इंद्र का हंस रूप में पूजन किया जाता है। इंद्र ने वसु के प्रेमवश स्वयं हंस का रूप धारण करके वह पूजा ग्रहण की थी।

इंद्र ने कहा था ‘जो भी मनुष्य मेरे इस उत्सव को रचाएंगे और मेरी पूजा करेंगे, उनके समूचे राष्ट्र को लक्ष्मी एवं विजय की प्राप्ति होगी। उनका सारा जनपद निरंतर उन्नतिशील और प्रसन्न होगा।’ सम्भवतः आज नववर्ष प्रतिपदा पर इसी की प्रतीक स्वरूप गूड़ी घर-घर टांगी जाती हैं।

सार यह है कि स्वधर्म के पालन से ही मुक्ति है। वसु अपने राजधर्म को त्यागकर तप करने लगे थे। देवताओं ने लोक कल्याण के लिए पुनः स्वधर्म में प्रवृत्त करा दिया।

नए संवत्सर पर ध्वज, गूड़ी आदि के माध्यम से इंद्र पूजा जीवन में देवत्व की ओर अग्रसर होने की मानव भावना का ही प्रतीक है। स्वर्ग का अर्थ है ऊँचाई। यह जीवन में ऊँचे विचार, श्रेष्ठ भाव, अच्छे कर्म और सर्वप्रिय व्यवहार से प्राप्त होती है। वसु ने इसे ऐसे ही पाया।

कहते हैं तब उन्हें यह सिद्धि हो गई कि वे साधारण मनुष्यों से दस हाथ ऊपर चलने लगे। इसीलिए वे उपरिचर वसु कहलाए। सत्यवती इन्ही की बेटी थी, जिसके पुत्र पराशरनन्दन वेदव्यास हुए। वसु ने स्वधर्म साधा, धर्म की रक्षा की, प्रजा का संरक्षण किया और देवताओं को पूज उत्सव रचाए।

नवसंवत्सर पर हम भी जीवन भर ऐसा ही कुछ करते रहने का संकल्प लें सकें तो अब की बार नया सवंत्सर कुछ ख़ास हो जाए!

विवेक कुमार चौरसिया


Subscribe us on YouTube