जीवन या परिवार प्रबंध का यह महत्त्वपूर्ण तथ्य है की अपने सहयोगियों, मित्रों या रिश्तेदारों पर भरोसा करते हुए जब उन्हें कोई कार्य करने की स्वतंत्रता दी जाती है, तो परिणाम निश्चित ही अच्छे मिलते हैं।
जब श्रीराम ने सुग्रीव को सीताजी की खोज की ज़िम्मेदारी सौंपी थी तब सुग्रीव को प्रत्येक निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ा था और शब्द कहे थे- “अब सोई जतनु कराहु मन लाई, जेहि बिधि सीता के सुधि पाई। ” अब मन लगाकर वही उपाय करो जिससे सीता की खबर मिल सके।
सुग्रीव ने अपने स्वतंत्र निर्णय से चार खोजी दल बनाए थे। सबसे योग्य दल में नील, अंगद, जामवंत, हनुमानजी आदि की अगुवाई में गए दल ने लंका तो ढूंढ निकाली लेकिन सीता की खोज के लिए अकेले हनुमानजी को भेजा गया। जाने से पहले हनुमानजी ने जामवंत से इस बात की शिक्षा ली थी की लंका में जाकर उन्हें करना क्या है? “जामवंत मै पूछउ तोही, उचित सिखावन दीजहु मोहि।” मै आपसे पूछता हूँ, मुझे उचित सीख देना की मुझे क्या करना चाहिए।
जामवंत ने कहा, “हे तात, तुम जाकर इतना ही करो की सीताजी को देखकर लौट आओ और उनको रामजी की खबर कह दो।” शेष वानर नहीं जानते थे की श्री हनुमान लंका जाकर आग लगा देंगे। रावण के दरबार मे बहस के बाद जब उनकी पूँछ मे आग लगाई गई तब हनुमानजी ने ही सम्पूर्ण लंका दहन का निर्णय लिया।
श्री हनुमान को निर्णय लेने की आज़ादी देने का परिणाम यह हुआ की श्री राम के पहुंचने के पहले ही सारे राक्षस उनके पराक्रम का एक बड़ा झटका देख चुके थे। उन्हें अनुमान लग चुका था की श्रीराम की सेना का यदि एक योद्धा लंका जला सकता है, तो पूरी सेना क्या नहीं कर सकती।
अपने साथियों को निर्णय का अधिकार देकर कार्य लेने की श्रीराम की यह विशिष्ट शैली थी। श्रीराम ने अपनी इस शैली का कई बार हनुमानजी के माध्यम से सफल प्रयोग किया था और इस माध्यम से हमें भी सिखाया की परिवार मे जब किसी बड़े लक्ष्य को प्राप्त करना हो, तो योग्यतानुसार सभी को निर्णय लेने का अधिकार दिया जाए।
पं विजयशंकर मेहता (जीवन प्रबंधन गुरु)
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