शरीर में प्राण और अपान वायु संतुलित हो तो योग साध्य होता है। योग और प्राणायाम के प्रयोगों से प्राण और अपान वायु सम बनती है, परंतु प्राण और अपान मुद्रा को करने से योग सिद्ध होता है। अभी हम प्राण मुद्रा की चर्चा करेंगे।
सांस के साथ-साथ जो वायु भीतर जाती है उसे प्राणवायु कहते हैं। इससे शरीर ऊर्जावान बनता है। प्राण मुद्रा का प्रयोग जीवनदायिनी शक्ति का संतुलन और शरीर को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए किया जाता है। प्राण मुद्रा करने के लिए अपनी कनिष्ठका तथा अनामिका अंगुली के अग्र भाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाएं। अंगूठे का उंगलियों पर हल्का सा दबाव रहे और तर्जनी और मध्यमा को सीधा रखें।
प्राण मुद्रा अपने जरूरत के अनुसार काफी समय तक की जा सकती है। प्राण ऊर्जा रूप, शक्ति रूप है। इंद्रिय, मन व भावनाओं को सात्विक बनाती है।
शारीरिक दृष्टि से मुद्रा एक स्वीच की भांति कार्य करती है, जिसे दबाने पर संपूर्ण शरीर में स्फुर्ती पैदा होती है। इस मुद्रा से प्राणशक्ति को संग्रहित कर हम सदैव स्वस्थ और निरोग रह सकते है।
रक्त वाहिनी नाडियों में किसी भी तरह की बाधा हो तो दूर होती है।
इस मुद्रा के प्रभाव से शरीर के किसी भी अंग में सूनापन दूर होता है। इस मुद्रा के नियमित प्रयोग से नेत्रों से संबंधित समस्या में दूर होती है।
यह मुद्रा थकावट के समय भी लाभकारी है। इसके करने से थोड़ी ही देर में नव शक्ति का संचार होगा, थकान दूर हो जाती है। एकाग्रता का विकास होता है, रक्त शुद्धि होने से शरीर में स्फूर्ति, चेतना में नया उत्साह, मन में अपूर्व उमंग, आत्मविश्वास भरता है। इस मुद्रा को निरंतर करने से भूख प्यास पर नियंत्रण होता है, इसलिए उपवास के वक्त विशेष लाभदायी है। अकारण खाने-पीने की इच्छा भी इस मुद्रा से नियंत्रित हो सकती है।
प्राण मुद्रा से आत्मबल पुष्ट होता है, देहजन्य रोगों से मुक्त होने के कारण भवरोग भी समाप्त होने लगते हैं।
प्राण मुद्रा में पृथ्वी, जल और अग्नि तत्वों का संयोजन होता है। शरीर में रसायनिक परिवर्तन होता है तथा शरीर के समस्त अवरोध दूर होते हैं।











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