हरी भरी वसुंधरा, रिमझिम बरसात, भरे-भरे नदी तालाब, मंद-मंद समीर निश्चय ही मन में उत्साह का उफान ले आता है। यही कारण है कि हमारी संस्कृति में सावन माह का हर दिन कुछ विशिष्ट बन गया है। हर दिन उत्सव का दिन है, हर उत्सव का अपना एक अलग अंदाज है।

उत्सवों से भरे इस सावन मास की एक और अन्य व्यवस्था भी है, उत्सव के साथ-साथ ये महिना उपवास का भी है। पूरे मास एक समय भोजन की प्रथा है, पूरा मास नहीं तो सोमवार का जिव्हा संयम तो अधिकतर लोग रखते हैं। अन्य दिवसों में भी इस संयम के अलग-अलग तरीके वर्णित हैं।
सावन मास की यह परम्परा जिंदगी की सही राह समझाती है। सफल और आनंदमयी जिंदगी जीनी है, तो मन में जीने का उत्साह होना बहुत जरूरी है। हर कार्य को उत्साह के साथ करना जरूरी है, उत्साह कार्य को बोझिलता से बचाता ही नहीं वरन् उसे आनंदमयी बना देता है। उत्साह नहीं तो जिंदगी नीरस बन, बोझ लगने लगती है और आप सब जानते हैं कि बोझा ढोया जाता है, जिया नहीं जाता। बोझ भार होता है, आनंदमयी नहीं होता।
श्रावण मास की उपवास व्यवस्था जीवन में संयम का महत्व समझाती है। मन के उत्साह पर मस्तिष्क का संयम, जीवन को संतुलित बनाता है। जीवन का संतुलित होना सुख, शांति और सफलता के लिये बहुत आवश्यक है। ये उत्साह पर लगी वो नकेल है जो जीवन को कभी भटकने नहीं देती।
सावन माह की इस सांस्कृतिक धरोहर को अपने जीवन प्रबंधन का मूल मंत्र बनाइये। हर हाल, हर परिस्थिति में स्फूर्ति और उत्साह को अपने मन से कभी अलग मत कीजिये और साथ ही संयम की डोर से अपने जीवन को हर घड़ी बांधे रखिये। निरंतर अभ्यास और मनोबल आप स्वयं इन दोनों का सुंदर समायोजन कर सकते हैं।
ये करेंगे तो राह जिंदगी की आसान ही नहीं सुंदर और मनमोहक बन जायेगी।










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