हम हर छोटी-मोटी बीमारी के लिए डॉक्टरों के चक्कर लगाते हैं और दवाईयों के दुष्प्रभाव को भी झेलते हैं। जबकि आपके किचन की मसालेदानी में ही कई बीमारियों का इलाज मौजूद है, बस इन्हें जानने भर की देर है।
अपनी दादी-नानी का जमाना याद कीजिए। कैसे वह छोटी-छोटी बीमारियों के उपचार के लिए किचन की ओर दौड़ती थी। लम्बे समय से मसालों का प्रयोग हम छोटी-मोटी स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के निदान में करते आ रहे हैं, लेकिन आज हम पारम्परिक औषधियों को भूलने लगे हैं।
किचन में मौजूद विभिन्न मसाले कितने गुणी हैं और इनमें किन-किन बीमारियों का हल छिपा है, आइये एक बार फिर याद कर लें।
धनिया

खड़ा हो या पिसा, सेहत के लिहाज से यह कैरोटीन का अच्छा स्त्रोत है। अर्थात धनिये में “विटामिन ए” बहुत अच्छी मात्रा में पाया जाता है। मुँह की दुर्गन्ध मिटाने के लिए भी धनिया चबाना बेहतर विकल्प है। मूत्र रोगों में भी इसका प्रयोग काफी किया जाता है।
जीरा

जीरे का तड़का स्वाद के साथ खुशबू तो बढ़ाता ही है, विभिन्न पेट विकारों के लिए औषधि के रूप में भी काम आता है। जीरे का पानी सुबह खाली पेट लेने से पुराना बुखार, भूख न लगने जैसी समस्याओं से निजात मिल जाती है। पाचन तंत्र को सुचारु बनाए रखने में भी जीरा मदद करता है।
मेथी

कढ़ी, रायते और कुछ सब्जियों में लगने वाले तड़के का अहम् हिस्सा है। यह फाइबर का सर्वोत्तम स्त्रोत है। मेथी के औषधीय लड्डुओं की अपनी अलग पहचान है। वहीँ मेथी पाउडर मिले आटे की चपाती बनाकर खाने से गैस नहीं बनती और तो और मेथी का नियमित उपयोग डाइबिटीज़ के मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे रोगी के रक्त में शर्करा का स्तर नहीं बढ़ता।
काली मिर्च

स्वाद में तीखी जरूर होती है, लेकिन दही और छाछ में इसकी वजह से ही अलग स्वाद आता है। यह आँखों के लिए भी बहुत अच्छी है। काली मिर्च, मिश्री और घी को संभाग में मिलाकर उपयोग करने से आँखों की रोशनी बढ़ती है। साथ ही इसका सेवन पेट में कीड़े नहीं पनपने देता। इसके अलावा यदि आपको खांसी हो तो काली मिर्च के 5-7 दाने मुँह में रखें, तुरंत आराम मिलेगा।
लौंग

एक तरह के सूखे फूल हैं, जिसका तेल दर्द निवारक माना गया है।
दांत दर्द से निजात पाने के लिए लौंग का तेल लगाना काफी पुराना नुस्खा है, जबकि सर्दी-जुकाम में लौंग का काढ़ा पीना भी प्रचलित है।
हल्दी

रंग और स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ कई औषधीय गुणों से भी भरपूर होती है। इसमें मौजूद एंटीसेप्टिक गुण इसे चोट या मोच लगने पर आवश्यक दवा बना देते हैं। इसी तरह घाव व चोट पर हल्दी का भी लेप किया जाता है। हल्दी वाला दूध पीना शरीर की अंदरूनी चोटों में आराम देने के अलावा शरीर की थकान को भी दूर करता है। त्वचा निखारने में हल्दी सभी तरह के सौंदर्य प्रसाधनों में अव्वल है।
जायफल

काफी गर्म तासीर का होता है।
इसलिए दादी-नानी ठण्ड के दिनों में इसे पीसकर छोटे बच्चों को पिलाती थी ताकि वे ठण्ड से तो बचें ही साथ ही उनमें प्रतिरोधक क्षमता का भी विकास हो।
बड़ी इलायची

बड़ी इलाइची को साबूत चावल में डाला जाता है। लगातार उल्टियां हो रही हो तो इसे चबाते हुए धीरे-धीरे खाएं, उल्टियां बंद हो जाएंगी। साथ ही छोटे बच्चों को यदि उलटी दस्त हो रहे हों तो थोड़े से आटे में बड़ी इलाइची भूने और इसे पीसकर शहद के साथ बच्चों को दें, तुरंत आराम मिल जाएगा।
हींग

हींग का प्रयोग डाल और सब्जियों में खुशबू और जायका बढ़ाने के लिए तो होता ही है, इसे गठिया जैसे रोग में भी असरदायक माना गया है।
छोटे नाखून में हींग लगा देने से पाचन अच्छा होता है। हींग हर तरह के पेट विकारों में भी बहुत काम की दवा है।
अजवायन

पाचन क्रिया को बढाती है। अजवायन में थाइमोल रसायन होता है, जो इसे रोग से लड़ने में सक्षम दवा बनाता है। यदि अजवायन को लम्बे समय तक पड़ा रहने दें तो इसमें से तेल अलग हो जाता है जिसे सत कहा जाता है।
अजवायन शरीर को गर्मी प्रदान करती है। इसी वजह से महिलाओं को प्रसव के बाद अजवायन खिलाई जाती है। इसके अलावा जावित्री, दालचीनी, शाहजीरा, तेजपत्ता, छबीला आदि का भी अपना औषधीय महत्व है।
अति अच्छी नहीं
अति हर हाल में बुरी होती है, की तर्ज पर तेज व तीखे मसालों का अत्यधिक सेवन स्वास्थ्य को बर्बाद कर सकता है। इन तीखे मसालों के अति सेवन से शरीर पर पड़ने वाला प्रभाव देखिये:
तीखे मसाले
लाल मिर्च, लौंग, जीरावन, काली मिर्च आदि के ज्यादा सेवन से पेट में जलन और गैस बनने लगती है। कुछ समय बाद यही समस्या गंभीर बीमारियों में तब्दील हो जाती है। तीखे मसालों के अति सेवन से कोलोन इन्फेक्शन(बड़ी आंत का संक्रमण) भी हो जाता है, जिससे दस्त और मलत्याग के दौरान तेज जलन होती है।

लीवर पर प्रभाव
मसाले शरीर में अवशोषित होकर लीवर में पहुँचते हैं। लीवर में अधिक अवशोषण होने से लीवर संक्रमित हो जाता है, जो हेप्टिक सिरोसिस(पीलिया) जैसी बीमारियों को बढ़ाने में अहम् भूमिका निभाता है।










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