कब मिलती है सम्पन्नता

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वर्तमान भौतिकवादी दौर में आर्थिक संपन्नता ही सर्वोपरी हो गई है। ऐसे में हर किसी का प्रश्न यही होता है कि उसकी आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी? आइये जानें ज्योतिष के आयने में सम्पन्नता के योग।

वर्तमान समय मे प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताएं बढ़ती जा रही है साथ ही साथ महत्वाकांक्षा भी अधिक हो रही है। इनकी पूर्ति के लिये रुपयों की आवश्यकता होती है। धन-रुपये पैसों से आज अधिकांश वस्तुओं का प्रबंध किया जा सकता है, इसी कारण व्यक्ति धन के पीछे भागता जा रहा है और उसके पाने के लिये निरंतर परिश्रम करता जा रहा है।

कई बार व्यक्ति धन के मोह में इतना अधिक अंधा हो चुका होता है कि वह धन के लिये अपने शरीर को इतना कष्ट देता है कि उसे नष्ट कर लेता है। बाद में उसी शरीर को बचाने के लिये कमाया गया धन सारा का सारा खर्च-नष्ट करने पर भी शरीर को नहीं बचा पाता है। धन कमाना एक अलग बात है, धन संचय करना एक अलग कला/प्रवृत्ति है।

धन तो सभी कमाते हैं परंतु संचय करना या उसे रोक लेना आसान नहीं होता। ज्योतिष ग्रंथों में धन संचय (लक्ष्मीवान) होने संबंधी अनेक योगों का उल्लेख है। यदि ये योग जातक की कुण्डली में हैं तो व्यक्ति निश्चय ही धनी होता है।


ये योग बनाते हैं सम्पन्न

सामान्य रूप से प्रथम दृष्टि में यह देखा जाता है कि कुण्डली मेंं चंद्र-मंगल की युति (एक साथ होना) है अर्थात कुण्डली में चंद्रमा एवं मंगल एक ही कालम में भाव/स्थान में विद्यमान है, तो ऐसा जातक जीवन के आर्थिक रूप से सम्पन्नता प्राप्त करता ही हैै। चंद्र-मंगल यदि आमने-सामने हैं तो भी आर्थिक संपन्नता उत्तम रहती है।

यदि चंद्र-मंगल आपस में राशि परिवर्तन कर रहे हों तो भी जातक को संपन्नता कठिन परिश्रम के उपरांत परंतु अवश्य मिलती है। इसके अतिरिक्त यदि द्वितीय स्थान का स्वामी ग्यारवें भाव में स्थित होकर द्वितीय भाव को देखता हो, यदि द्वितीय भाव का स्वामी उच्च का हो तथा उस पर शुभ ग्रह गुरू-चंद्र, बुध, शुक्र की दृष्टि हो, द्वितीय भाव का स्वामी नवम/पंचम में श्रेष्ठ स्थिति में विद्यमान हो, द्वितीय भाव का स्वामी गुरू अपनी उच्च राशि में नवम भाव में (वृश्चिक लग्न में) उपस्थित हो, तो भी अच्छी सम्पन्नता होती है। इसी प्रकार नवम भाव एवं लग्न अपनी उच्च राशि में हों या उत्तम स्थित में हो।


नवम भाव के विशिष्ट योग

नवम एवं लग्न का राशि परिवर्तन योग हो, लग्न एवं नवम भाव के स्वामी दोनों एक साथ विद्यमान हों, या केंद्र त्रिकोण में श्रेष्ठता से युक्त हों, लग्न एवं नवम भाव के स्वामी आपस में देख रहे है, लग्न का स्वामी लग्न को तथा नवम भाव का स्वामी नवम भाव को अथवा लग्नेश-भाग्येश को तथा भाग्येश लग्न को देख रहा हो केंद्रों के स्वामी अपनी उच्च स्थिति में विद्यमान हों।

नवम एवं लग्न के स्वामी केंद्र में हों तथा उन पर शुभ ग्रहों (गुरु-चंद्र,शुक्र, बुध) की दृष्टि हो। इन योगों में से एक योग भी कुण्डली में है तो आप समझ लीजिये कि आप जीवन में निश्चित रूप से आर्थिक उन्नति करेंगे तथा अपने सोचे कार्यों में निश्चित रूप से सफलता प्राप्त कर लेंगे।


सम्पन्न बनाने वाले अन्य योग

अब प्रश्न उठता है कि क्या जिन व्यक्ति की कुण्डली में उपरोक्त योगों की अनुपलब्धता है तो वे अभाव में ही रहेंगे? नहीं इसके अतिरिक्त भी बहुत से ऐसे योग होते हैं जिनके कारण जातक अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होते हैं। प्राय: देखा गया है कि कुण्डली में चंद्रमा की पीड़ित अवस्था होने पर जातक के पास धन तो खूब आता है परंतु टिकता नहीं है।

ऐसे जातक को चंद्रमा का रत्न धारण करना लाभकारी सिद्ध होता है। साथ ही पीड़ा देने वाले ग्रह की शांति करना भी लाभदायक होता है। जिन जातकों की कुण्डली में लग्नेश (लग्न का स्वामी) तथा भाग्येश (भाग्य का स्वामी) यदि पाप ग्रह अर्थात् (सूर्य-मंगल-शनि-राहु-केतु) से पीड़ित हैं तो उन्हें धन संचय में काफी परेशानी आयेगी। यदि जातक संबंधित ग्रह की शांति, जाप अथवा दान करें तो निश्चित ही वह आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त करेगा।


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