मैं नारी हूं

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भारतीय संस्कृति के मनीषियों ने नारी का कई रूपों में वर्णन किया है। ऐसे में वर्तमान दौर में भी नारी का महत्व प्रतिपादित होना अनिवार्य है और वह भी निष्पक्ष रूप से। नारी के संदर्भ में इस कार्य को अंजाम दे सकती है, तो सिर्फ नारी, क्योंकि न तो उसमें स्वार्थ होता है और न ही नारी के प्रति दया भावना। तो आईये वर्तमान दौर के परिप्रेक्ष्य में देखें नारी की स्थिति इस आर्टिकल ‘मैं नारी हूं’ ख्यात चिंतक मधु बाहेती की जुबानी।

मैं अपने पति की सहधर्मिनी और संतान की जननी हूं। मुझसा संसार में और कौन है? सारा जगत मेरा कर्म क्षेत्र है, मैं स्वाधिनी हूं, क्योंकि मैं अपनी इच्छानुरूप कार्य कर सकती हूँ। मैं दुनिया में किसी से नहीं डरती, मैं महाशक्ति की अंश हूं। मेरी शक्ति पाकर ही मनुष्य शक्तिमान है। मैं स्वतंत्र हूं पर उच्छृंखल नहीं हूं। मैं शक्ति का उद्गम स्थान हूं परन्तु अत्याचार के द्वारा अपनी शक्ति को प्रकाशित नहीं करती। मैं सिर्फ कहती ही नहीं करती भी हूं, मैं काम ना करूं तो संसार अचल हो जाए। सब कुछ करके भी मैं अहंकार नहीं करती।

मेरा कर्म क्षेत्र बहुत बड़ा है। वह घर के बाहर भी है और अंदर भी। घर में मेरी बराबरी की समझ रखने वाला कोई है ही नहीं। मैं जिधर देखती हूं उधर अपना कर्तव्य पाती हूँ। मेरे कर्तव्य में बाधा देने वाला कोई नहीं है क्योंकि वैसा शुभ अवसर मैं किसी को देती ही नहीं। पुरुष मेरी बात सुनता है क्योंकि मैं गृह स्वामिनी जो हूं, मेरी बात से गृह संसार उन्नत होता है। इसीलिए पति के संदेह का तो कोई कारण है ही नहीं और संतान, वह तो मेरी है ही। उसके लिए तो हम दोनों व्यस्त हैं। इन दोनों को पति को और संतान को अपने वश में करके मैं जगत में अजय हूं। डर किसको कहते हैं यह मैं नहीं जानती। मैं पाप से घृणा करती हूं अतएव डर मेरे पास नहीं आता।

संसार में मुझसे बड़ा और कौन है? मैं तो किसी को भी नहीं देखती, जगत में मुझसे छोटा भी कौन है उसको भी कहीं नहीं खोजती हूं। पुरुष दंभ करता है कि मैं जगत में प्रधान हूँ, बड़ा हूं। मैं किसी की परवाह नहीं करता। वह अपने दम्भ और दर्प से देश को कँपाना चाहता है। वह कभी आकाश में उड़ता है, कभी सागर में डुबकी मारता है और कभी रणभेरी बजाकर आकाश – वायु को कँपा कर दूर-दूर तक दौड़ता है परन्तु मेरे सामने तो वह सदा छोटा ही है क्योंकि मैं उसकी मां हूं। उसके उग्र रूप तो हजारों लाखों हैं परंतु मेरे उंगली हिलाते ही वह चुप हो जाने के लिए बाध्य है। मैं उसकी मां केवल बचपन में ही नहीं सर्वदा और सर्वत्र हूँ। जिसका दूध पीकर उसकी देह पुष्ट हुई है, उस मातृत्व के इशारे पर सर झुका कर चलने के लिए बाध्य है।

मैं पढ़ती हूं संतान को शिक्षा देने के लिए, पति के थके मन को शांति देने के लिए। मेरा ज्ञान जीवन में विवेक का प्रकाश फैलाने के लिए है। मैं गाना-बजाना सीखती हूं शौकीनों की लालसा पूर्ण करने के लिए नहीं वरन नर-हृदय को कोमल बनाकर उसमें पूर्णता लाने के लिए। पुरुष की सोई संवेदना जगाने के लिए मैं स्वयं नहीं नाचती, वरन जगत को नचाती हूँ।

मैं सीखती हूँ सिखाने के लिए, शिक्षा के क्षेत्र पर मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। मैं सृजन करती हूं आदर्श का। बनाती हूं मानव को महामानव। मैं दूसरी भाषा सीखती हूं पर बोलती अपनी ही भाषा हूं और मेरी संतान उसे गौरव के साथ मातृभाषा कहती है। क्या मुझे पहचान लिया है? नहीं तो फिर पहचान लो मैं नारी हूं।

मैं खड्गधारिणी काली हूं पाखंडी का वध करने के लिए, मैं दस भुजाओं वाली दुर्गा हूं संसार में नारी शक्ति को जगाने के लिए। मैं लक्ष्मी हूं संसार को सुशोभित करने के लिए। मैं सरस्वती हूं विद्या वितरण के लिए।

रामायण और महाभारत में मेरी ही कथाएं हैं। इनमे मेरा ही गान हुआ है। यही कारण है कि जगत का और जगत के लोगों को जीवन विद्या का शिक्षण देने में इनके समान अन्य कोई भी ग्रंथ समर्थ नही हुआ है।


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