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Arthritis causes types and treatment

पंगु बनाने वाला रोग- गठिया

आमतौर पर गठिया को एक ऐसी बीमारी के रूप में जाना जाता है, जो आमतौर पर अच्छे भले व्यक्ति के जोड़ों को जकड़ कर उसे चलने-फिरने तक का मोहताज अर्थात पंगु बना देता है। वृद्धों की समझी जाने वाली इस बीमारी की चपेट में अब युवा वर्ग भी बड़ी संख्या में आ रहा है। आइये जानें क्या हैं, इससे बचाव के आसान उपाय?

Kailash-Laddha

आमवात जिसे गठिया भी कहा जाता है, अत्यंत पीड़ादायक बीमारी है। अपक्व आहार रस याने ‘आम’ ‘वात’ के साथ संयोग करके गठिया रोग को उत्पन्न करता है। अत: इसे आमवात भी कहा जाता है। इसमें जोडों में दर्द होता है, शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है। छोटे-बड़े जोड़ों में सूजन का प्रकोप होता रहता है। यूरिक एसिड के कण (क्रिस्टल्स) घुटनों के साथ अन्य जोड़ों में भी जमा हो जाते हैं।

जोडों में दर्द के मारे रोगी का बुरा हाल रहता है। गठिया के पीछे यूरिक एसीड की जबर्दस्त भूमिका रहती है। इस रोग की सबसे बडी पहचान ये है कि रात को जोडों का दर्द बढता है और सुबह अकड़न महसूस होती है। यदि शीघ्र ही उपचार कर नियंत्रण नहीं किया गया तो जोडों को स्थायी नुकसान हो सकता है। अत: गठिया के ईलाज में हमारा उद्धेश्य शरीर से यूरिक एसिड बाहर निकालने का प्रयास होना चाहिये।


यूरिक एसिड है इसका कारण

यह यूरिक एसिड प्यूरीन के चयापचय के दौरान हमारे शरीर में निर्मित होता है। प्यूरिन तत्व मांस में सर्वाधिक होता है। इसलिये गठिया रोगी के लिये मांसाहार जहर के समान है। वैसे तो हमारे गुर्दे यूरिक एसिड को पेशाब के जरिये बाहर निकालते रहते हैं। लेकिन कई अन्य कारणों की मौजूदगी से गुर्दे यूरिक एसिड की पूरी मात्रा पेशाब के जरिये निकालने में असमर्थ हो जाते हैं। इसलिये इस रोग से मुक्ति के लिये जिन भोजन पदार्थो में प्युरीन ज्यादा होता है, उनका उपयोग कतई न करें। याद रहे, मांसाहार

शरीर में अन्य कई रोग पैदा करने के लिये भी उत्तरदायी है। वैसे तो पतागोभी, मशरूम, हरे चने, वालोर की फ़ली में भी प्युरिन ज्यादा होता है लेकिन इनसे हमारे शरीर के यूरिक एसिड लेविल पर कोई ज्यादा विपरीत असर नहीं होता है। अत: इनके इस्तेमाल पर रोक नहीं है। जितने भी सॉफ्ट ड्रिन्क्स हैं, सभी परोक्ष रूप से शरीर में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ाते हैं, इसलिये सावधान रहने की जरूरत है।


यह अपनाऐं के आसान उपाय

सबसे जरूरी और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मौसम के मुताबिक 3 से 6 लीटर पानी पीने की आदत डालें। ज्यादा पेशाब होगा और अधिक से अधिक विजातीय पदार्थ और यूरिक एसिड बाहर निकलते रहेंगे। आलू का रस 100 मिली भोजन के पूर्व लेना भी हितकर है। संतरे के रस में 15 मिली काड लिवर आईल मिलाकर शयन से पूर्व लेने से गठिया में आश्चर्यजनक लाभ होता है।

लहसुन, गिलोय, देवदारू, सौंठ, अरंड की जड ये पांचों पदार्थ 50-50 ग्राम लें। इनको कूट-खांड कर शीशी में भर लें। 2 चम्मच की मात्रा में एक गिलास पानी में डालकर ऊबालें, जब आधा रह जाए तो उतारकर छान लें और ठंडा होने पर पी लें। ऐसा सुबह शाम करने से गठिया में अवश्य लाभ होगा। लहसुन की कलियां 50 ग्राम लें।

सैंधा नमक, जीरा, हींग, पीपल, काली मिर्च व सौंठ 2-2 ग्राम लेकर लहसुन की कलियों के साथ भली प्रकार पीस कर मिलालें। यह मिश्रण अरंड के तेल में भून कर शीशी में भर लें। आधा या एक चम्मच दवा पानी के साथ दिन में दो बार लेने से गठिया में आशातीत लाभ होता है। हर सिंगार के ताजे पती 4-5 नग लें। पानी के साथ पीस लें या पानी के साथ मिक्सर में चला लें। यह नुस्खा सुबह-शाम लें 3-4 सप्ताह में गठिया और वात रोग नियंत्रित होंगे। जरूर आजमाएं।


आयुर्वेद में है स्थायी समाधान

आयुर्वेदिक चिकित्सा भी कई मामलों मे फ़लप्रद सिद्ध हो चुकी है। पंचामृत लोह गुगल, रसोनादि गुगल, रास्नाशल्ल की वटी, तीनों एक-एक गोली सुबह और रात को सोते वक्त दूध के साथ 2-3 माह तक लेने से गठिया में बहुत फ़ायदा होता है। उक्त नुस्खे के साथ अश्वगंधारिष्ट, महारास्नादि काढ़ा और दशमूलारिष्टा 2-2 चम्मच मिलाकर दोनों वक्त भोजन के बाद लेना हितकर है। चिकित्सा वैज्ञानिकों का मत है कि गठिया रोग में हरी साग सब्जी का प्रचुरता से इस्तेमाल करना बेहद फ़ायदेमंद रहता है। पत्तेदार सब्जियों का रस भी अति उपयोगी रहता है।

भाप से स्नान करने और जेतुन के तैल से मालिश करने से गठिया में अपेक्षित लाभ होता है। गठिया रोगी को कब्ज होने पर लक्षण उग्र हो जाते हैं। इसके लिये गुन गुने जल का एनिमा देकर पेट साफ़ रखना आवश्यक है। अरण्डी के तैल से मालिश करने से भी गठिया का दर्द और सूजन कम होती है। सूखे अदरक (सौंठ) का पावडर 10 से 30 ग्राम की मात्रा में नित्य सेवन करना गठिया में परम हितकारी है।

चिकित्सा वैज्ञानिकों का मत है कि गठिया रोगी को जिन्क, केल्शियम और विटामिन सी के सप्लीमेंट्स नियमित रूप से लेते रहना लाभकारी है। गठिया रोगी के लिये अधिक परिश्रम करना या अधिक बैठे रहना दोनों ही नुकसान कारक होते हैं। अधिक परिश्रम से अस्थिबंधनो को क्षति होती है जबकि अधिक गतिहीनता से जोड़ों में अकड़न पैदा होती है।

एक लीटर पानी तपेली या भगोनी में आंच पर रखें। इस पर तार वाली जाली रख दें। एक कपड़े की चार तह करें और पानी मे गीला करके निचोड़ लें । ऐसे दो कपडे रखने चाहिये। अब एक कपड़े को तपेली से निकलती हुई भाप पर रखें। गरम हो जाने पर यह कपड़ा दर्द करने वाले जोड़ पर 3-4 मिनिट रखना चाहिये।

इस दौरान तपेली पर रखा दूसरा कपड़ा गरम हो चुका होगा। एक को हटाकर दूसरा लगाते रहें। यह विधान रोजाना 15-20 मिनिट करते रहने से जोड़ों का दर्द आहिस्ता-आहिस्ता समाप्त हो जाता है। यह बहुत कारगर उपाय है।