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अकाल मृत्यु से मुक्त करते भगवान महाकालेश्वर

म.प्र. के उज्जैन शहर अर्थात प्राचीन अवंतिका पूरी के राजा के रूप में प्रतिष्ठित भूतभावन महाकालेश्वर 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है। मान्यता है कि इनके दर्शन मात्र से अकाल मृत्यु पास नहीं फटकती क्योंकि ये कालों के काल हैं।

उज्जयिनी का महाकालेश्वर मंदिर सर्वप्रथम कब निर्मित हुआ था, यह कहना कठिन है। निश्चित ही यह धर्मस्थल प्रागैतिहासिक देन है। पुराणों में सन्दर्भ आये हैं कि इसकी स्थापना प्रजापति ब्रम्हाजी द्वारा की गई थी।

हमें सन्दर्भ प्राप्त होते हैं कि छठी सदी में उज्जैन के एक वीर शासक चंडप्रद्योत ने महाकालेश्वर परिसर की व्यवस्था के लिए अपने पुत्र कुमार सेन को नियुक्त किया था। उज्जयिनी के चौथी-तीसरी सदी ई.पू. के कतिपय प्राप्त सिक्कों पर महाकालेश्वर मंदिर का उल्लेख आया है।

चाहे बाण हो या पद्मगुप्त, राजशेखर हो अथवा श्री हर्ष अथवा तुलसीदास सभी ने इनका वर्णन किया। बाणभट्ट के प्रमाण से ज्ञात होता है कि महात्मा बुद्ध के समकालीन उज्जैन के राजा प्रद्योत के समय महाकाल का मंदिर विद्यमान था।

कालिदास द्वारा भी अपने ग्रन्थ में मंदिर का उल्लेख किया गया। पंचतंत्र, कथासरित्सागर आदि से भी इस मंदिर की पुष्टि होती है। समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार होता रहा होगा, क्योंकि इस परिसर से ईसवी पूर्व द्वितीय शताब्दी के भी अवशेष प्राप्त होते हैं।


बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक

भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकाल की प्रमुख रूप से प्रतिष्ठा है। सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन, उज्जैन में महाकाल, डाकिनी में भीमशंकर, परली में वैद्यनाथ, ओंकार में ममलेश्वर, सेतुबंध पर रामेश्वर, दारूकावन में नागेश, वाराणसी में विश्वनाथ, गोमती के तट पर त्र्यम्बक, हिमालय पर केदार और शिवालय में घृष्णेश्वर।

भगवान महाकालेश्वर को अपमृत्यु जैसे दुर्योगों का नाशक माना जाता है। आम मान्यता है-

अकाल मृत्यु वो मरे, जो काम करे चांडाल का।
काल उसका क्या करे, जो भक्त हो महाकाल का।


मुग़लकाल में भी रहा विशिष्ट सम्मान

गुप्त काल में तो इसका उल्लेख है ही, इस के उपरान्त अनेक राजवंशों ने उज्जयिनी की धरती का स्पर्श किया। इन राजनीतिक शक्तियों में उत्तर गुप्त, कलचुरी, पुष्यभूति, गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

सबने भगवान महाकाल के सम्मुख अपना शीश झुकाया और यहाँ प्रभूत दान-दक्षिणा प्रदान की। दसवीं शती के राजशेखर, ग्याहरवीं शती के राजा भोज आदि ने न केवल महाकाल का सादर स्मरण किया, अपितु भोजदेव ने तो महाकाल मंदिर को पंचदेवाय्रान से संपन्नभी कर दिया था।

उनके वंशज नर वर्मा ने महाकाल की प्रशस्त प्रशस्ति वहीँ शिला पर उत्कीर्ण करवाई थी। परमार राजवंश की कालावधि में 1235 ई. में इल्तुतमिश ने महाकाल के दर्शन किये थे। 18वीं सदी के पूर्वार्द्ध में राणोजी सिंधिया के मंत्री रामचंद्राव शेणवे ने महाकाल का भव्य मंदिर पुनर्निर्मित करवाया, जो वर्तमान में भी मौजूद है।

कहा जाता है कि मुगल काल में भी अकबर ही नहीं बल्कि लगभग हर मुगल बादशाह ने भगवान महाकालेश्वर के मंदिर के विकास में सहयोग देकर अपनी श्रद्धा प्रकट की थी।


वर्तमान में अत्यंत भव्य स्वरुप

महाकालेश्वर का विश्व-विख्यात मंदिर पुराण-प्रसिद्ध नगरों के सप्तसागरों में से एक रूद्रसागर के पश्चिम में प्राचीन महाकाल वन में स्थित है। महाशक्ति हरसिद्धि माता का मंदिर इस सागर के पूर्व में स्थित रहा है और आज भी है।

महाकालेश्वर के परिसर में उपस्थित है, कोटि तीर्थ। सदियों से पुण्य-सलिला शिप्रा, पवित्र रुद्रसागर एवं पावन कोटि तीर्थ के जल से भूतभावन भगवान महाकालेश्वर के विशाल ज्योतिर्लिंग का अभिषेक होता रहा है।

पौराणिक मान्यता है कि अवंतिका में महाकाल रूप में विचरण करते समय यह तीर्थ भगवान की कोटि व पाँव के अंगूठे से असंख्य मंदिरों के साथ उत्पन्न हुआ। वर्तमान में विशाल क्षेत्र में निर्मित भव्य मंदिर स्वर्ण जड़ित शिखर से युक्त है। आम दिनों में भी प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु दर्शन करने देश-विदेश से आते हैं। यहाँ विशेष दर्शन पास तथा महाकाल प्रसादी की व्यवस्था मंदिर समिति की ओर से है।

भस्मारती में शामिल होने के लिये मंदिर की वेबसाइट पर ऑनलाइन पंजीयन करवाया जा सकता है। मंदिर समिति द्वारा संचालित धर्मशालाऐं भी हैं, जिनमें ठहरने के लिये ऑनलाइन कमरे बुक करवाए जा सकते हैं। अपनी इच्छानुसार मंदिर में विद्वान पंडितों से अभिषेक भी करवाया जा सकता है।


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