बोनसाई अर्थात् छोटे रूप में बड़े पेड़ों को गमलों में लगाना वास्तव में यह कला हमारे ही देश की प्राचीन कला है। पौराणिक प्रमाण के आधार पर इस कला को विश्व स्तर पर स्थापित करती हुई सर्वाधिक बोनसाई वृक्षों के प्रदर्शन के लिये ‘‘गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड’’ में अपनी नाम दर्ज करवा चुकी हैं, बोनसाई मास्टर पुणे निवासी प्राजक्ता काले।
समाजसेवी गिरधारी काले (काल्या) की धर्मपत्नी प्राजक्ता काले की पहचान न सिर्फ पुणे शहर या महाराष्ट्र प्रदेश तक सीमित है बल्कि उनकी ख्याति सम्पूर्ण विश्व में उनकी उपलब्धियों की पताका फहरा रही हैं। इसमें उनके परिवार की वेदशास्त्र तथा आयुर्वेद के प्रति रूचि सहयोगी बनी।
श्रीमती काले गत 36 वर्षों से इन्टरनेशनल बोनसाई मास्टर व डायरेक्टर के रूप में कृषकों, स्व सहायता समूहों तथा ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के बेरोजगार युवाओं के लिये संस्था ‘‘बोनसाई नमस्ते’’ का संचालन करते हुए इस कला को विश्व स्तर पर भी प्रतिष्ठित कर रही हैं।
उन्होंने 10 एकड़ क्षेत्र में विश्व का सबसे बड़ा ‘‘बोनसाई गार्डन’’ तैयार किया है, जो पर्यटकों के लिये आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह गार्डन ‘‘बोनसाई आर्ट’’ को लेकर आयोजित वर्कशॉप, सेमिनार व प्रशिक्षण का केंद्र भी बना हुआ है।
प्राचीन वामन वृक्ष कला को किया प्रतिष्ठित
इस कला के प्रोत्साहन के पीछे श्रीमती काले का लक्ष्य प्राचीन भारत की ‘‘वामन वृक्ष कला’’ को पुन: प्रतिष्ठित करना है, जो वर्तमान में विश्व स्तर पर बोनसाई आर्ट के रूप में जानी जाती है। वे अपने प्रयास के अंतर्गत विश्व के सबसे बड़े ‘‘इंटरनेशनल बोनसाई कन्वेंशन और प्रदर्शनी’’ का पुणे में आयोजन कर चुकी हैं।
इसमें 2 लाख से अधिक लोगों ने शामिल होकर ‘‘बोनसाई आर्ट’’ के बारे में जाना व देखा। उन्होंने अंग्रेजी तथा मराठी में एक पुस्तक ‘Bonsai, India’s Ancient Art of Vaman Vriksha’ लिखी है, जो इस कला के बारे में जागरूकता उत्पन्न करती है।
राहुरी कृषि विद्यापीठ के सहयोग से उन्होंने ‘‘बोनसाई आर्ट’’ में डिप्लोमा सर्टीफिकेट कोर्स भी स्कील इंडिया मिशन के अंतर्गत सृजनात्मकता के विकास के लिये तैयार किया है। श्रीमती काले की विशेषता यह है कि वे अपने समस्त बोनसाई वृक्षों की देखभाल गत 36 वर्षों से बच्चों की तरह कर रही हैं।
क्या है आखिर बोनसाई
आयुर्वेद में हमारे ऋषि मुनि अलग-अलग प्रकार के वृक्षों के पत्तों व जड़ से दवा बना करके देते थे। एक ही जगह पर बैठकर हमारे ऋषियों को सभी को दवा देना संभव नहीं हो रहा था, एकजगह से दूसरी जगह जाना और उसी प्रदेश में ठीक उसी गुण का पेड़ मिलना संभव नहीं होता था इसलिए उन्होंने वृक्षों को गमले में लगाना शुरु किया।
हर बार दवाई के लिये उस पेड़ के अलग-अलग हिस्से को काटकर निकालते थे। एक जगह से दूसरी जगह पर छोटे-छोटे पोधे ले जाते थे। हर बार दवाई के लिये काटने कि वजह से पौधा छोटा रहता था। इसे सब वामनवृक्ष कहने लगे और यह बोनसाई याने वामन वृक्ष कला कहलाई।
कहा गया है वही कला भारत से विदेशों में चली गई और उसका नाम बोनसाई हो गया। यह कला पौराणिक प्रमाण के आधार पर हमारे देश की कला है, इस कला को विस्तार करने के लिए स्थापित करती हुई सर्वाधिक याने 3333 वामन वृक्षों का प्रदर्शन आयोजित करने के लिए गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज करने का सम्मान बोनसाई मास्टर पुणे निवासी प्राजक्ता काले को मिला है।
सम्मान की वृहद श्रृंखला
श्रीमती काले अपने इन योगदानों के लिये वर्ष 2018 में ‘‘गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड’’ से सम्मानित होने का गौरव भी प्राप्त कर चुकी हैं। इसके साथ ही वे कई अंतर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। इनमें द यूरोपियन इन्टरनेशनल युनिवर्सिटी पेरिस (फ्रांस) द्वारा ‘‘प्रोफेशनल डॉक्टोरल सर्टीफिकेट’’, इन्डोनेशिया बोनसाई सोसायटी द्वारा ‘‘ग्रांड मास्टर’’, इन्टरनेशनल बोनसाई क्लब की प्रतियोगिता की विजेता सहित 17 अंतर्राष्ट्रीय मास्टर्स सम्मान से वे सम्मानित हो चुकी हैं।

बोनसाई यूरोप द्वारा ‘‘बोनसाई एंजेल’’, वर्ल्ड बोनसाई फ्रेंडशिप फेडरेशन द्वारा ‘‘आऊटस्टेडिंग बोनसाई अवार्ड’’, बोनसाई क्लब इंटरनेशनल द्वारा ‘‘द एक्सीलेंट अवार्ड’ तथा इंडोनेशिया बोनसाई सोसायटी द्वारा ‘‘दी जुरी अवार्ड’’ से सम्मानित किया जा चुका है। उनके ‘‘बोनसाई नमस्ते इन्टरनेशनल कान्वेंशन’’ की सफलता के लिये ‘‘हो ची मिन्च सिटी बोनसाई एसोसिएशन’’ द्वारा भी सम्मानित किया गया था।
राष्ट्रीय स्तर पर सिक्किम के राज्यपाल द्वारा ‘‘पुणे प्राइड अवार्ड’’, सश्यबंधु अवधूत दत्ता पीठम मैसूर द्वारा ‘‘स्पेशल अवार्ड’’, नेशनल वुमन्स सम्मिट 2018 नईदिल्ली द्वारा ‘‘एक्सीलेंस अवार्ड’’, माहेश्वरी समाज के अंतर्राष्ट्रीय महाधिवेशन जोधपुर में ‘‘प्रतिभा सम्मान अवार्ड’’ तथा महाराष्ट्र सरकार द्वारा ‘‘जीजा माता कृषि भूषण अवार्ड-2018’’ आदि से सम्मानित हो चुकी है। पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने भी उनके योगदानों को सराहा था।










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