देश भक्ति की अनुपम मिसाल थे- सेठ गोविन्ददास मालपानी

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जब भी देश के स्वतंत्रता आंदोलन की बात होती है, तो उसमें माहेश्वरी समाज के इतिहास पुरूष सेठ गोविन्ददास मालपानी का नाम एक महानायक के रूप में लिया जाता है। कारण है उनका वह त्याग जो उन्होंने देश के लिये किया। उनका व्यक्तित्व राजनैतिक क्षेत्र के लिये आज भी मिसाल बना हुआ है।

सेठ गोविन्ददास न सिर्फ माहेश्वरी समाज के गौरव थे बल्कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन के वे ऐसे इतिहास पुरूष थे, जिन्हें इतिहास कभी विस्मृत नहीं कर सकता। इस आंदोलन में मध्यप्रदेश का उल्लेख ही सेठ गोविन्ददास के बिना अधुरा है। उनका महत्व मध्यप्रदेश के लिये वही है, जो महाराष्ट्र के लिये तिलक, पंजाब के लिये लाला लाजपतराय, बिहार के लिये राजेन्द्र बाबू, गुजरात के लिये सरदार पटेल तथा उत्तरप्रदेश के लिये पं मदनमोहन मालवीय व मोतीलाल नेहरू आदि का है। फिर भी यदि आर्थिक त्याग की बात हो तो शायद सेठ गोविन्ददास का नाम ही शीर्ष पर आऐगा क्योंकि देश के खातिर अपनी अकूत सम्पत्ति को त्यागकर उन्होंने एक सामान्य जीवन बिताया, लेकिन देश से बड़ा किसी को भी न समझा ।


अत्यंत सम्पन्न परिवार में लिया जन्म

सेठ गोविन्ददास का जन्म 16 अक्टूबर 1896 को जबलपुर म.प्र. में राजा गोकुलदासजी के पौत्र के रूप में दीवान बहादुर जीवनदास के यहाँ हुआ। राजा गोकुलदासजी उस समय देश के ऐसे शीर्ष व्यवसायी थे, जिनकी हुण्डियाँ सम्पूर्ण भारत के साथ ही काबुल, कंधार, रंगून, सिंगापुर, कोलम्बो तथा कोआलालम्पुर तक चलती थी।

देश-विदेश में उनकी लगभग 375 गादियाँ थीं, जहाँ हजारों मुनीम व गुमाश्ते काम करते थे। गोकुलदासजी सिर्फ व्यवसायी ही नहीं थे, बल्कि मध्यप्रदेश की दो रियासतों जबलपुर व छिन्दवाड़ा के स्वामी भी थे। उनके परिवार के पास कितनी अकूत सम्पत्ति थी, इसका अनुमान सेठ गोविन्ददासजी के विवाह से लगाया जा सकता है। उनके विवाह में अनुमानित रूप से दोनों पक्षों का मिलाकर आज के मान से 2 अरब से भी अधिक रुपया खर्च हुआ था।


ऐसे बदली जीवन की दिशा

किसी ने सोचा भी नहीं था कि सोने की चम्मच से खाना खाने वाला राजकुमार एक दिन आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ छोड़कर कूद पड़ेगा। जलियांवाला बाग हत्याकांड उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बना। अंग्रेज हूकमत के इशारे पर हुई सैंकड़ों निर्दोष लोगों की हत्या ने इन्हें झकझोर कर रख दिया।

पैतृक रूप से तो राजकीय परिवार होने के कारण उनके परिवार के अंग्रेजों से मधुर संबंध थे, लेकिन इन सबके बावजूद भी वे अपने मन में गुलामी के खिलाफ उठ रहे शोले को रोक न सके। सन् 1916 में जब इनकी उम्र मात्र 20 वर्ष थी, तब वे लोकमान्य तिलक के सम्पर्क में आए। तिलक के जबलपुर आगमन पर गोविन्ददास जी ने अपने महल में ही लोकमान्य तिलक का स्वागत किया और उनकी स्वराज पार्टी में शामिल हो गये।


देश के लिये सब कुछ न्यौछावर

इनके इस कार्य से अंग्रेज नाराज हो गये और उन्होंने स्पष्टीकरण मांगा। गोविन्ददासजी ने उत्तर में निर्भिकता से लिखा कि जिस प्रकार हम अपने यहाँ राजा-महाराजाओं का सत्कार करते रहे हैं, उसी प्रकार देश के महान नेता लोकमान्य तिलक का स्वागत करके भी हमने अपने कर्त्तव्य का पालन किया है।

अंग्रेजों की दमन-नीति से घबराकर आपके पिता दीवान बहादुर ने आपके समक्ष परिवार की सम्पत्ति के बंटवारे का प्रस्ताव रखा, ताकि सरकार परिवार की सारी सम्पत्ति जब्त न कर सके। इस पर आपने पत्र लिखा- ‘पिता-पुत्र के बीच सम्पत्ति का बंटवारा कैसा? वे सारी पारिवारिक सम्पत्ति का ही त्याग करते हैं।’ इसके बाद आप सुख-सुविधाओं और ऐशोआराम से युक्त अपने महल को छोड़ अपने परिवार के मंदिर के बगीचे में ही रहने लगे।


कई बार भुगती जेल

सन् 1920 में बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु होने पर स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व पूर्ण रूप से महात्मा गाँधी के हाथों में आ गया। आजादी की आग सीने में लिये सेठ गोविन्ददास राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गये। असहयोग आंदोलन में जबलपुर की बागडोर इन्होंने ही सम्भाली। आपके आह्वान पर देखते ही देखते एक बहुत बड़ी राशि स्वराज फंड में एकत्र हो गई। कांग्रेस कमेटी ने सत्याग्रह आंदोलन का निर्णय लिया, इसमें भावना को जानने के लिए छह सदस्यीय इन्क्वायरी कमेटी गठित हो गई।

इस कमेटी के जबलपुर भ्रमण व वहाँ की जानकारी एकत्र करने की जिम्मेदारी भी इन्होंने ही वहन की। गाँधीजी के सत्याग्रह आंदोलन के महाकौशल में संचालन की बागडोर सेठजी ने ही सम्भाली। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान सन् 1923, 30, 32, और 42 में लंबी सजा भुगती।

कई बार आपके ऊपर जुर्माना हुआ और उसे न देने पर आपकी कार जब्त कर ली गई। सेठजी के लोकप्रिय व्यक्तित्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आप लगातार 20 वर्ष तक महाकौशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर आसीन रहे।


धर्मपत्नी भी बनी सहभागी

जब सेठ गोविन्ददास मात्र 12 वर्ष के थे, तभी इनका विवाह सीकर राजस्थान की 8 वर्षीय गोदावरीबाई से सन् 1908 में हो गया था। अतः गोदावरीबाई शिक्षित नहीं थी, लेकिन गोविन्ददासजी की प्रेरणा से वे भी शिक्षा की ओर अग्रसर हुई और उन्होंने भी मूलभूत शिक्षा ग्रहण की।

गोदावरीबाई भी स्वतंत्रता आंदोलन सहित अन्य समाज सुधारों में सेठजी के साथ कंधे से कंधे मिलाकर चलीं। पर्दा प्रथा का विरोध करने वालों में भी वे आगे रहीं। इसके लिए समाज व रिश्तेदारों के विरोध का सामना करना पड़ा।

जिस समय सेठजी जेल में होते थे, तब गोदावरी बाई स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर सम्भालती थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए ही वे महात्मा गाँधी की मुँह बोली बेटी कही जाती थीं।


देश के लिये कोई समझौता नहीं

सेठ गोविन्ददास जिन्होंने देश व सत्य के लिए अपना पैतृक सम्पत्ति छोड़ दी, उन्हें जीवन में कोई भी सत्य के पथ से डिगा नहीं पाया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आप महाकौशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे, लेकिन आजादी के बाद राजनीति से दूर हो गए।

सिद्धांतों व आदर्शों से समझौता कर लेते तो संभव है कि मुख्यमंत्री अथवा केन्द्र में कोई वरिष्ठ मंत्री होते लेकिन कुर्सी का मोह उनके सिद्धांतों के सामने नतमस्तक हो गया। फिर भी क्षेत्र की जनता की भावना का सम्मान करते हुए आजीवन लोकसभा सदस्य रहे व कुछ समय के लिये अस्थायी रूप से लोकसभा अध्यक्ष भी रहे।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिये अपनी ही पार्टी के खिलाफ इस्तीफा देने तक के लिये अड़ गये थे। हिन्दी भाषा व हिन्दी साहित्य के उन्नयन में उनका जो योगदान है वह तो इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अंकित है।


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