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ममता ने बनाया जगत ‘मम्मी’ शांतादेवी बियाणी

प्रपौत्र एवं दोहित्र से भरे पूरे परिवार में निवास कर रही काँटाफोड़ जिला देवास निवास शांतादेवी बियाणी वैसे तो गृहस्थ ही है, लेकिन उनकी आध्यात्मिक आस्था किसी संत से कम नहीं है। इस पर भी उनकी विशेषता है, उनके मन में उमड़ता ममता का वह सागर जिसने उन्हें जगत “मम्मी” का स्थान दिला दिया।

काँटाफोड़ जिला देवास ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र में शांतादेवी “मम्मी” के नाम से जानी जाती है। वे कांटाफोड़ गाँव में मोहनलाल बियाणी की धर्मपत्नी बनकर आयी थी लेकिन आज “जगत मम्मीजी” के नाम से प्रसिद्ध है।

उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि चाहे कोई भी समाज हो, किसी भी उम्र का व्यक्ति हो, गाँव में अधिकतर लोगो को तो आज भी उनका वास्तविक नाम नहीं पता। वास्तव में देखा जाये तो उन्हें यह सम्मानजनक स्थान उनके ममतामय सरल स्वाभाव ने ही दिलाया।


नाम भी किया चरितार्थ:

सिवनी मालवा में नन्दलाल सारडा एवं बसंती बाई के घर जन्मी तीन बहनो और दो भाइयो कि लाड़ली बहन का नाम शांता रखा गया था। पहले घर के बड़े जन बचपन में ऐसे नाम रखते थे, जिनका कोई अर्थ हो। इस नाम के अनुरूप ही “मम्मीजी ” शांतादेवी बियाणी का स्वभाव है।

ये सिर्फ हमारे घर-परिवार का ही नहीं बल्कि पूरे गाँव का मानना है। गाँव में आज भी समाज के घरों में कोई भी समस्या आती हो या जन्म से लेकर मरण तक रीती-रिवाज के बारे में जानना हो, सब उनके पास बेझिझक सलाह लेने आते है।

शांतादेवी बियाणी

इसका प्रमुख कारण है, उनका अनुभवी जीवन, जो ज्ञान का भंडार है साथ ही उनका शांत और सहज स्वभाव जिसमें धैर्य और साहस भरा है। आपकी अमीट छवि सिर्फ गाँव तक ही सिमित नहीं रही है बल्कि आपके गुरु स्वामी जी श्री विष्णुप्रपन्नाचार्यजी महाराज ने भी अपने विशेष परम वैषणव शिष्यों में आपको स्थान दिया है।


गुरु की नज़र में भी सम्मानीय:

उनके पौत्र ने बताया कि छत्रीबाग वेंकटेश मंदिर में ब्रम्होत्सव का आयोजन चल रहा था व तीसरे दिन जब भगवान कि सवारी मंदिर प्रांगण में घूम रही थी , तब स्वामीजी सवारी के आगे चल रहे थे। उनके दोनों पोते भी उन्हें दर्शन कराने लेकर गए हुए थे।

बहुत भीड़ थी , जब पुनः स्वामीजी रुके तो ये दोनों और मम्मीजी उनके चरण स्पर्श के लिए आगे बढे। मम्मीजी कि कमर समस्या है, वो झुक नहीं पाती। जैसे ही वो झुकने को तत्पर हुई, उसके पहले ही स्वामी जी ने अपना एक चरण इतने ऊपर उठा लिया कि मम्मीजी उनको आराम से छू सके।

गुरु शिष्य के इस अनोखे प्रेम सम्बन्ध ने हमे बहुत स्पष्ट समझा दिया कि ये गुरु कृपा इतनी सरलता से हर किसी को कहां मिलती है? इसके लिए अपने आप को कितना योग्य बनाना पड़ता है, उसकी जीती जगती प्रेरणा है, मम्मीजी।


इनकी नज़र में शांतादेवी:

गुरु नागोरिया पीठाधीश्वर स्वामीजी श्री विष्णुप्रपन्नाचार्यजी जी महाराज लिखते हैं-

परम श्री वैषणवी शांता बाई का व्यक्तित्व सहज, सरल और समर्पण कि मूरत है। आपकी आचार्य शरणागति परिपूर्ण है। बाबूजी जब बीमार थे, तब चिकित्सालय में भी आप उनको नित्य स्वरुप धारण करवाती थी। आपके जीवन में कथनी और करनी में भेद नहीं है।

उर्मिला होलानी (वरिष्ठ समाजसेविका – कांटाफोड़) लिखती हैं-

काँटाफोड़ में इनकी पहचान विशेष कर सिवनी वाली भाभीजी और मम्मीजी के नाम से है। ये गुरु और भगवान पर आश्रित है और करती है दोनों पर पूरा विश्वास। उनके इस विश्वास और भरोसे से ही हँसता खेलता है, इनका परिवार।

ये हमेशा सबके सहयोग के लिए तत्पर रहती है और सब इनके सहयोग के लिए तत्पर रहते है। स्वभाव इनका बहुत शांत है पर हाँ यदि कोई गलती करता है तो इनका नरम दिल बिल्कुल कठोरता से उसको समझाता भी है, यह इनकी एक बहुत बड़ी खासियत है।

मंगला सिंगी (पूर्व देवास जिला अध्यक्ष – कांटाफोड़) लिखती हैं-

वे हम सबकी प्रेरणा स्त्रोत है। हमारे गाँव में विशेष कर समाज में जब कोई मिलता है तो सर्वप्रथम जय श्री मन्नारायण कहता है।

ये कहने कि प्रथा इन्होने ही हमे सिखायी है। इसका लाभ ये है कि मिलने के दौरान सबसे पहले कोई क्या बोले तो क्यूँ ना भगवान का नाम लेकर ही बात कि शुरुआत हो ताकि सब शुभ ही हो।


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Sri Maheshwari Times

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