साहित्य व समाज को समर्पित युगल- डॉ विनोद-विद्या सोमानी

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उम्र का उत्तरार्द्ध व्यक्तिगत जिम्मेदारियों से मुक्ति का पड़ाव अवश्य है लेकिन मानव मूल्यों के कर्त्तव्यों से विमुख होने का नहीं। अजमेर निवासी वरिष्ठ दम्पत्ति डॉ. विनोद-विद्या सोमानी ऐसे ही युगल हैं, जो उम्र के उत्तरार्द्ध में तो हैं लेकिन साहित्य व समाजसेवा का कोष वे सतत रूप से परिपूरित कर रहे हैं, अपने मूलभूत कर्त्तव्य की तरह। आईय जानें उनकी कहानी उनकी सुपुत्री उदयपुर निवासी डॉ. श्रद्धा गट्टानी की जुबानी।

जीवन की वास्तविकता से दो चार होते मेरे पापा ने एक मधुर गीत लिखा था, जिसका मुखड़ा है-

“जीवन तो वैसे ही बंधु कष्टों का इतिहास है।
साहस का अश्व थाम ले, पतझड़ भी मधुमास है।।’’

यह उनके जीवन पर शत प्रतिशत खरा उतरता है। मेरे पापा एवं मम्मी माहेश्वरी समाज के घरों में जन्मे, थपेड़े खाते हुए बड़े हुए और अनवरत संघर्ष करते हुए इधर उधर देखे बिना आगे बढ़ते रहे। यह सब कुछ इतना आसान नहीं था पर, प्रभु कृपा से इन दोनों का मिलन अप्रैल 1963 में अजमेर में हुआ। विवाह हुआ और किराये के मकान से जीवन का प्रारंभ हुआ।

पिता भारतीय जीवन बीमा निगम में कार्यरत थे और माँ विद्या जन्मी तो अजमेर में लेकिन विवाह के समय जयपुर निवासी स्व. श्रीलक्ष्मीकुमार बिड़ला की सुपुत्री के रूप में पली बड़ी हुई थी। पांच बहनें और एक भाई, संघर्षों भरा जीवन रहा।

प्राईवेट अध्ययन किया लेकिन अधिक नहीं पढ़ पाई पर संगीत, चित्रकला, गृहकार्य, सेवा भावना व व्यवहार कुशलता में अव्वल रही। आकर्षण व्यक्तत्व की धनी तो थीं, ही। पिताजी विनोदजी को भा गई और दो अभावों में जूझते साथ हो लिये जीवन के संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाकर।


संघर्ष में भी जज्बा व कलम साथ-साथ

पिताजी कवि, कहानीकार, उपन्यासकार रहे। उनका लेखन सर्विस के साथ-साथ चलता रहा। मेट्रिक प्राईवेट, इन्टर प्राईवेट फिर बी.ए., एम.ए. मॉर्निंग क्लासेस से किया। साईकिलों से भागदौड़ की। माँ विद्या ने घर संभाल लिया। सौभाग्य किसी न किसी रूप में साथ नहीं छोड़ता। लगातार सात पुत्रियां पैदा हुई पर ये कभी हीनता से ग्रस्त नहीं हुए। पति-पत्नी में भी कभी इस मुद्दे पर विवाद न हुआ।

मिल-जुलकर उनका भविष्य बनाने में लगे रहे। माँ उन्हें पढ़ाती, नहलाती, उनकी ड्रेसें स्वयं सिलती, कापियाँ पुस्तकें लाती, उनके कवर चढ़ाती और ऐसा कभी नहीं लगने दिया कि ये अभावों में जी रहे हैं। एक वेतन में सब कुछ। सायंकाल श्री दाता की भगवान की सामूहिक आरती करना, भजन गाना और बच्चों को सही मार्ग पर चलने का संदेश देना। एक जज्बा था जो सातों बहनों का भविष्य बनाने में लगा था।


पुत्र-पुत्रियों में भेदभाव नहीं

पुत्रियों के बाद एक पुत्र का जन्म हुआ। न उल्लास न हंगामा। जन्मदिन पुत्रियों के नहीं मनाये तो पुत्र का भी नहीं मनाया। एक सा व्यवहार। माँ सस्ती से सस्ती साड़ी पहनती पर कलर संयोग ऐसा कि वे अमीर लगतीं। समाज में पुत्रियों को संगीत, स्वास्थ्य, कविता पाठ, नाटक, पढ़ाई में प्रवीणता प्राप्त होती तो स्कूल में सोमानी सिस्टर्स की धाक रही। सबमें मिले पुरस्कार।

माँ के इस त्याग व तपस्या का फल पुत्रियों को मिला। सबका समय पर प्रतिष्ठित परिवारों में विवाह हुआ और समाज में अपना वर्चस्व बनाया। आज सभी बहनें गर्व से समाजसेवा कर रही हैं, यश कमा रही हैं और अपने माता-पिता, सास-ससुर व पतियों का नाम उज्जवल कर रही हैं।

मेरे पापा एवं मम्मी ने कम खाया, सस्ता पहना, फिजूलखर्ची नहीं की और समाज में सातों बेटियों को सम्मान दिलाया। भाई श्यामकुमार सोमानी सी.ए. है, पी. एच.डी तथा शिक्षित हैं और प्रसिद्ध अस्पताल के वाईस प्रेसिडेंट हैं। भाभी संजना एम.कॉम., बी.एस.सी., बी.एड है। होनहार भतीजी-भतीजा हैं जो हर क्षेत्र में आगे रहते हैं, वसुंधरा-आशुतोष।


समाजसेवा व लेखन के प्रति समर्पित

मेरी मम्मी ने इन अभावों को झेलते हुए भी समाज में अपना उल्लेखनीय स्थान बनाया। सन् 1972 में अखिल भारतवर्षीय माहेश्वरी महासभा के कोलकाता अधिवेशन में पापा के साथ सक्रियता से भाग लिया। कवि सम्मेलन में भाग लिया और पुरस्कार प्राप्त किये। अनेक बार समाज की महत्वपूर्ण बैठकों की अध्यक्षता की और समाज सुधार व बेटियों के उत्थान, दहेज प्रथा को मिटाने के सुझाव दिये। बड़ी-बड़ी बारातों के विरोध स्वरूप अपनी राय रखी।

कई पुस्तकों का प्रकाशन किया व पाठशालाओं व पात्र विद्वानों को नि:शुल्क पुस्तकें प्रदान की। दैनिक भास्कर में साढ़े चार वर्षों तक हर सप्ताह राजस्थानी में ‘‘धनचकरी’’ नाम से कॉलम लिखकर समाज में जागृति पैदा की। राजस्थान के कवि संकलन में इन्हें स्थान मिला। हमें भी सदा हर क्षेत्र में प्रोत्साहित करती रहती हैं। आज मैं जो कुछ हूँ मम्मी व पापा के उत्साहवर्धन के परिणामस्वरूप हूँ।

पापाजी इस समय 83 वर्ष के हो चुके हैं परंतु, सक्रिय हैं। साहित्य जगत में अनेकों पुरस्कार प्राप्त किये। कोर्स में उनकी लिखी रचनाएं पढ़ाई जा रही हैं। 11वीं तथा एम.ए. में इनकी कृतियाँ हैं। अजमेर के सर्वाधिक और सबसे अधिक श्रेष्ठ पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले पापा आकाशवाणी, दूरदर्शन से दर्जनों बार प्रसारित हो चुके हैं।

राजस्थानी व हिन्दी में 32 पुस्तकें प्रकाशित हैं और अनवरत लेखन में व्यस्त रहते हैं। महासभा के कार्यकारी मण्डल के सदस्य रह चुके हैं। मेरे पापा एवं मम्मी प्रचार प्रसार से दूर मौन साधना के हामी हैं। समाज में सकारात्मक विचार फैलें, दिखावा न हो, सादगी हो, भाईचारा हो ये इनके भाव रहते हैं। दोनों नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों के प्रचार प्रसार में व्यस्त रहते हैं।


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