केवल अशुभ ही नहीं होती- शनि की साढ़े साती

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शनि की साढ़े साती के नाम से लगभग हर व्यक्ति परिचित हैं। इसका अर्थ ही सामान्यतः एक भयानक रूप में लिया जाता है। शनि की साढ़े साती यानि की भयानक दौर की शुरूआत। वैसे शास्त्रों में भी राजा हरिशचंद्र व विक्रमादित्य जैसे महारथियों के बारे में शनि की साढ़े साती को लेकर कई कथाऐं प्रचलित हैं, जिनमें इसने जातक का सब कुछ छीन लिया था। इस कथाओं के प्रचलन से आम व्यक्ति में शनि की साढ़े साती को लेकर कई भ्रांतियाँ व्याप्त हो गई हैं। हर कोई इसे नकारात्मक रूप में ही लेता है, लेकिन ऐसा ही नहीं है। शनि की साढ़े साती कई बार अत्यंत शुभफलदायी होकर उन्नति का कारण भी बन जाती है।


कब होती है शनि की साढ़े साती

‘‘रिफः रूप धन भेषु भास्करिः संस्थितो भवति यस्य जन्मभात्।
लोचनोदर पदेषु संस्थिति कथ्यते रविजलोकजेर्जनैः।’’

अर्थात जिसकी जन्मराशि, जन्मराशि से द्वितीय और द्वादश भाव में शनि स्थित हो तो ‘शनि की साढ़े साती’ होती है। इसे शनि के गोचर में स्थितिवश ही माना जाता है।

इस तरह देखा जाऐ तो शनि जब गोचर में जातक की जन्म चंद्र राशि से पूर्व राशि में आता है, तो शनि की साढ़े साती की शुरूआत हो जाती है और जन्म राशि से अगली राशि में शनि के स्थित होने तक साढ़े साती रहती है। इस तरह गोचर में शनि की साढ़े साती में शनि जन्मराशि की पूर्व राशि, जन्म राशि व जन्म राशि के बाद वाली राशि में क्रमानुसार भ्रमण करता है।

शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक रहता है। अतः यहाँ इन कुल तीन राशियों में भ्रमण में कुल साढ़े सात वर्ष का समय लगता है। प्रत्येक राशि में शनि भ्रमण का ढाई-ढाई वर्ष का समय शनि की साढ़े साती के तीन चरण कहलाता है।

जब शनि जन्म राशि से पूर्व अर्थात बारहवीं राशि में आता है, तो साढें साती ‘सिर’ में कही जाती है और यह चढ़ती साढ़े साती भी कहलाती है। जन्म राशि पर शनि के स्थित होने पर इसे ‘हृदय’ पर तथा अगली अर्थात् जन्म राशि से दूसरी राशि में शनि की स्थिति पर इसे उतरती साढ़े साती कहते हैं।

उदाहरणार्थ- यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में चंद्र सिंह राशि में स्थित है, तो उसकी जन्म राशि सिंह होगी। शनि गोचर में जब सिंह से पूर्व कर्क राशि में आऐगा, तो साढ़े साती की शुरूआत होगी और सिंह से अगली राशि कन्या में शनि के स्थित होने तक साढ़े साती रहेगी।


क्या होती है शनि की ढैया?

शनि की साढ़े साती की तरह ही शनि के गोचर वश ही ढैया की स्थिति भी होती है। जब शनि जन्म राशि से चौथी और आठवीं राशि में शनि होता है, तो इसे ‘शनि की ढैय्या’ कहते हैं। शनि की ढैय्या सम्बंधित राशि में गोचर अनुसार ही ढाई वर्ष की रहती है।

उदाहरणार्थ- जैसे सिंह राशि वाले जातक की जन्म कुण्डली में गोचरवश जब सिंह से चौथी वृश्चिक राशि में शनि हो या आठवीं मीन राशि में शनि हो तो जातक शनि के ढैय्या के प्रभाव में रहेगा।


कब होता है अशुभ फल

शनि की साढे साती या ढैय्या का अर्थ ही यह नहीं है कि वह मृत्युकारक या अनिष्टकारक होगा। वास्तव में देखा जाऐ तो जब शनि 2, 7, 8 अथवा 12वें भाव का स्वामी हो, वह अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, एवं शनि की दशा-अन्तर्दशा भी चल रही हो तो इन स्थितियों के योगवश कष्टकारी स्थिति बनती है। चंद्र राशि से शनि साड़े साती स्वास्थ्य और सामान्य सुखों पर प्रभाव डालती है।

जब यही स्थिति सूर्य राशि से हो तो व्यवसाय प्रभावित होता है। इन सभी स्थितियों में गोचरस्थ शनि जिस भाव में होगा उससे सम्बंधित फल की हानि तो करेगा ही, साथ ही वह चंद्र राशि से सम्बंधित फल की हानि भी करेगा। जैसे जब शनि कर्क राशि में आऐगा तो भाईयों के साथ कुल व संचित धन तथा देह सुख की हानि भी करेगा।


कब बनती है कल्याणकारी स्थिति?

जब शनि जन्म कुण्डली में त्रिकोण, लग्न, तीसरे, छटे या ग्यारहवें भावों का स्वामी होकर मित्र या शुभग्रहों से दृष्ट होकर 5, 9, 3, 6 या ग्यारहवें भाव में स्थित हो तो शनि की साढ़े साती चमत्कारिक रूप से कल्याणकारी होती है। यह जातक को धन, मान-सम्मान और आर्थिक उन्नति सबकुछ देती है।

साढ़े साती

यदि उस स्थिति में शुभ ग्रह की दशा अन्तर्दशा चल रही हो तो और भी अधिक शुभ फल प्राप्त होते हैं। इसमें शनि व राशि जिस भाव से सम्बंधित होगी उससे सम्बंधित फल की वृद्धि अवश्य ही होगी। निष्कर्ष रूप में देखा जाऐ तो शनि भी वैसा ही ग्रह है, जैसे अन्य ग्रह। यह भी शुभ तथा अशुभ दोनों ही फल अपनी स्थितिवश देता है। उनसे बढ़कर इसकी विशेषता यह है कि जब यह शुभ स्थिति में होता है, तो जातक को हर सुख की लगभग वर्षा ही कर देता है।

वर्तमान दौर में जितने भी सफल लोग हैं, वे सभी शनि की कृपा से ही सफल हुए हैं। शनि की शुभता की सबसे बड़ी शर्त आचरण की शुद्धता है। यदि यह ठीक है, तो जन्म कुण्डली में शनि की अशुभ स्थिति भी इतनी अशुभ नहीं रह जाती।


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