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बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घर से दूर रखना उचित अथवा अनुचित?

प्रतियोगिता के दौर में अधिकांशतः हर माता-पिता अपने बच्चों को अन्य बच्चों की तुलना में अधिक सफल और ऊंचाई पर देखना चाहते हैं । अपने बच्चे में हुनर हो या न हो अगर कोई दूसरा बच्चा कुछ विशेष पढ़ाई/कार्य कर रहा हो तो उसका उदाहरण दे-देकर अपने बच्चे पर कुछ खास बनने और करने का दबाव बनाने लगते हैं। इसी क्रम में बच्चे का मन हो या ना हो भेड़चाल की तरह औरों की देखा देखी अपने बच्चे को अपने गांव/शहर से बाहर दूसरे शहर अथवा विदेश भेजकर उसको अपना कैरियर बनाने के लिए हरसंभव दबाब बनाते हैं। अब तो यह एक फैशन या आधुनिक शब्दों में स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। वही दूसरी ओर आमतौर पर लोग वर्तमान दौर की प्रतिस्पर्धा में इसे अनिवार्य भी मान रहे हैं।

ऐसे में यह विचारणीय हो गया है कि आवश्यक न होने पर भी बच्चों को पढ़ाई अथवा कैरियर के लिए घर-परिवार से दूर दूसरे शहर में भेजना उचित है अथवा अनुचित? आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


परिपक्व बच्चे को ही बाहर पहुँचाऐं
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

sumita mundra

बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए माता-पिता बड़े यतन-जतन करते हैं। यह सोचकर कि जब वो बच्चों के साथ न हों तब उनके बच्चे को किसी भी तरह की परेशानी न हो। बच्चों को घर से दूर भेजने के विभिन्न कारण हो सकते हैं जैसे कि गांव या छोटे शहर में बच्चों की शिक्षा और कैरियर के लिए सुविधा नहीं हो तो मजबूरन माता-पिता को बच्चों को दूसरे बड़े शहर में भेजना ही पड़ता है।

यह भी सच है कि कई शहरी माता-पिता आवश्यक न होने पर भी मात्र अपने स्टेटस सिंबल को बढ़ाने के लिए बच्चों को दूसरे शहर भेजने से नहीं चूकते; जो उचित नहीं है। जन्म से ही माता-पिता बच्चों को हरसम्भव सुविधाएं देने की कोशिश करते हैं। बच्चों की परवरिश में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं रखते, बच्चों की हर इच्छा पलक झपकते ही पूरी करते हैं। यही बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो माता-पिता के लाड़-प्यार का नतीजा बच्चों के स्वभाव में दिखने लगता है।

बच्चे पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। अब ऐसे बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घर-परिवार से दूर भेजना जरूरी हो जाता है। अगर घर पर ही बच्चों को जिम्मेदारियां दी जाये तो बाहर भेजने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पर आत्मनिर्भरता के साथ बच्चों में पारिवारिक धर्म-संस्कार-संस्कृति का होना भी अतिआवश्यक है जो बच्चों को परिवार में रहकर ही प्राप्त हो सकते हैं।

बच्चों को घर से दूर भेजने का कारण कुछ भी हो पर बच्चों में जब परिपक्वता और समझदारी आ जाये तभी उन्हें घर से दूर किया जाना चाहिए। कच्ची उम्र में घर-परिवार से दूर करना बच्चों के लिए उचित नहीं। बच्चों को घर से दूर करना कहीं ना कहीं बाल-भावनाओं को चोट पहुंचाता है जो एक वक्त के बाद परिलक्षित होती है।


अपना ईगो इसमें शामिल न करें
सपना श्यामसुंदर सारडा, सुरेंद्रनगर

आज यह एक फैशन हो गया है कि बच्चों को बाहर शिक्षा के लिए भेजें। भले ही अपने गाँव या शहर में अच्छी शिक्षा मिल रही हो। यह एक देखा- देखी वाला कार्य है। अगर बच्चों में शिक्षण के प्रति लगाव है तो वह बच्चे कितनी भी विपरीत परिस्थिति हो अच्छा पढ़ लेते हैं। जिन बच्चों को पढ़ना ही नही, उनको आप भले परदेश ही क्यो ना भेजो, वह ना पढ़ेंगे ना कुछ बनेंगे।

आज हर व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चे आत्मनिर्भर हो मगर उसके लिए अपने बच्चे को अपने घर से दूर रखना यह उसका सही पर्याय नही हो सकता। अगर आपके गाँव-शहर के आसपास ही बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलती हो तो बच्चों को अपने नजदीक ही रखें, जिससे बच्चों का अपने परिवार से लगाव बना रहे और बच्चो पर आपका पूरा ध्यान रहे।

बच्चे भी आजकल अपने दोस्त-मित्रों की देखा-देखी में अपने परिवार की आर्थिक हालत को ना देखते हुए घर से दूर रहने की जिद करते हैं वह भी सरासर गलत है। मेरी राय में अगर बच्चों को शुरुआत से ही यह सब बाते समझा सको तो इस समस्या से बहुत हद तक निजात पा सकते हैं।

बच्चों को अपने घर से दूर ना रखते हुए भी उसका उज्वल भविष्य हम बना सकते हैं। बशर्ते यह सब अपनी प्रतिष्ठा और अपने ईगो से ना जोड़े तो बच्चों का भविष्य भी बनेगा और बच्चों को और आपको दोनों को एक-दूसरे का प्यार भी मिलेगा।


आवश्यक न होने पर बाहर रहना अनुचित
प्रहलाद दास पारीक, जयपुर

मेरे मत में यदि हमारे गांव-कस्बे-शहर में अध्ययन की उचित सुविधाएं नहीं हैं तो ही अन्य शहर में हमें संतान को भेजना चाहिए। अन्यथा तो हमारे शहर में भी बाहर से बच्चे आते हैं तो हम क्यों नहीं पढ़ा सकते। बालक दूसरे स्थान पर निश्चित रूप से स्वच्छंदता का पाठ पढ़ रहे हैं।

मेरी बुजुर्ग मां हमेशा कहती थी कि एक बार घर से बाहर रहने वाले का घर पर मन नहीं लगता है। यदि बच्चे भविष्य में अलग एकल परिवार बसाकर रहना चाहते हैं और मां-पिता की सहमति है तो समस्या नहीं है। हम आये दिन देखते हैं शैक्षिक कार्य के लिए अकेले रहने वाले बच्चों को अवसाद का शिकार हो कर आत्महत्याएं करने जैसे कायराना कदम उठाने की सोच आ रही है। अतः वैयक्तिक रूप में मैं परिवार के साथ रहने का पक्षधर हूँ।


जरूरत पर ही बाहर जाना ठीक
मीना कलंत्री, वसई

ये बच्चे की कार्यक्षमता पर निर्भर करेगा। हर एक माँ-बाप का सपना होता है कि उनकी औलाद स्वयं से अच्छी और समझदार हो। शैक्षणिक क्षेत्रों में बहुत आगे बढ़े। कोई भला उनका अच्छा क्यूँ नही सोचेगा। विषय है उन्हें आत्मनिर्भर बनाना, तो परिस्थित और सुविधाएं अगर मुहैया होती है तो बच्चा गाँव में रहकर भी ऊँचाइयाँ हासिल करेगा।

अगर उसमें समय व कठिनाइयों का सामना करने की ताकत नही है तो घर से बाहर सुविधाओं में रहकर भी शून्य ही रहेगा। बच्चे की क्षमता और हुनर को ध्यान में रखकर लिया निर्णय सही साबित होगा। जिस तरह किसान का बेटा बचपन से ही खेती से जुड़ा होता है, उसे खेती में ही अपना भविष्य नज़र आता है। दूसरी ओर व्यापारी का बेटा बड़ी कंपनी का मालिक बनने के सपने साकार करने की कोशिश करते रहता है।

कम्पनी की लागत से मार्केटिंग तक का हिसाब शुरू करने लगता है। इसमें व्यक्ति को सिर्फ दिमाग दौड़ाने की जरूरत होती है, ना ही दूर रहने की। चुनौतियों को स्वीकार करके स्पर्धा में अव्वल आना है तो गाँव क्या शहर क्या? अगर लगता है कि हमें सही मार्गदर्शन या कार्यशाला या काम करने के लिए लगने वाली फंडिंग यहां प्राप्त नहीं हो सकती तो ऐसे में घर से बाहर जाने में कोई बुराई नहीं।


युवाओं को प्रगति के अवसर दें
अनुभि राठी, रतलाम

वर्तमान काल प्रतिस्पर्धा का है। तकनीकी युग में समय के साथ चलने के लिए बच्चों को प्रगतिशील एवं आत्मनिर्भर बनना ही होगा। कक्षा बारहवीं तक बच्चे घर पर रहकर शिक्षा ग्रहण करें व उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए बाहर जाऐं।

बच्चों को माता-पिता का मार्गदर्शन व संस्कार घर से मिलते हैं फिर घर से दूर रहकर उन्हें अच्छे बुरे का भान हो जाता है। बाहर रहकर अनुभव ग्रहण कर वे अपने परिवार के साथ रहकर भी स्वयं का उद्यम शुरू कर सकते हैं।

आजकल के बच्चे बहुत ही जागरूक हैं कि उन्हें भविष्य में क्या करना है और कैसे? अभिभावकों का यह दायित्व होना चाहिए कि कैरियर बनाने के लिए युवाओं को बाहर भेज कर प्रोत्साहित करें।


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