हरियाली देखना, महसूस करना और उसका आंनद लेना सबको पसंद है तभी तो आजकल हम अपने आसपास के वातावरण को भी हरा-भरा रखने की कोशिश करते हैं। फिर भी अफसोस है, इस बात पर कि अक्सर हम प्राकृतिक तरीके के स्थान पर अप्राकृतिक तरीके का इस्तेमाल करते हैं अर्थात् प्लास्टिक के पेड़-पौधे लगाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर लेते हैं। चूँकि प्लास्टिक का इस्तेमाल करना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी गलत है फिर भी प्राकृतिक तरीके से लगाये गए पेड़-पौधों की देखरेख से बचने के लिए हम यह तरीका अपनाते हैं। इसके पीछे हमारा लक्ष्य कृत्रिम ही सही लेकिन उस स्थान की सुंदरता को बढ़ाना होता है। वास्तव में यह मानव स्वभाव है। दूसरी तरफ अगर हम सेहत के प्रति जागरूक हों और अपनी पसंद हरियाली को प्राकृतिक तरीके से लगाएं तो निःसंदेह हमारा वातावरण स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हरा-भरा रहेगा।
ऐसे में यह विचारणीय हो गया है कि प्राकृतिक अथवा अप्राकृतिक किस रूप में हरियाली हमारे लिए हितकारी होगी? आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।
आवश्यक नहीं नयनाभिराम वस्तुएं स्वास्थ्यवर्धक भी हों
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव
हमारे आसपास की चीजें नयनाभिराम और मनभावन हो सकती हैं पर यह जरूरी नहीं है कि वह स्वास्थ्यवर्धक भी हों। प्राकृतिक पेड़-पौधे लगाने के लिए वातावरण अथवा जगह की कमी आदि कारणों को अपवाद मान भी लिया जाए तो भी सच यही है कि प्राकृतिक पेड़-पौधे लगाने के लिए आवश्यक मेहनत से हम बचना चाहते हैं और अपनी सुविधानुसार कृत्रिम (प्लास्टिक) हरियाली लगाकर कृत्रिम संतुष्टि से ही तृप्त हो जाते हैं।
यह जानकर भी हम अनजान बने रहते कि प्लास्टिक का उपयोग वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी नुकसानदेह है। अगर थोड़ी सी दूरदर्शिता रखकर घर-ऑफिस अथवा अपने आसपास के स्थानों पर प्राकृतिक हरियाली को लगाया जाए तो सारा वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भर जाएगा। साथ ही नई पीढ़ी को प्रकृति के प्रति एक संदेश मिलेगा।
धीरे-धीरे गमलों अथवा छोटे-पौधे की देखरेख का मामूली सा काम हमारा शौक और दिनचर्या का हिस्सा बन जायेगा। हरियाली के लिए आपका एक कदम दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकता है। जरूरी नहीं कि आप अनगिनत गमलों और पेड़ों को लगाओ; पर दो-चार गमले तो अपने घर-आंगन में लगाए जा सकते हैं।
हरियाली मूल रूप में ही उचित
पल्लवी दरक न्याती, कोटा
आज हमारे बीच हरे-भरे जंगल खत्म होते जा रहे है और कांक्रिट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में कांक्रिट के जंगलों के बीच यदि अप्राकृतिक पेड़-पौधे या हरियाली; मात्र प्रदर्शन हेतु लगाई जाती है, तो यह प्रकृति के हित में नहीं है। वृक्ष संवर्धन आज की महती आवश्यकता है। कांक्रिट के जंगलों के बीच में हरे-भरे वृक्ष, पेड़-पौधे लगाए जाएं।
जिससे मानव सहित सभी प्राणियों के लिए शुद्ध वातावरण उपलब्ध हो सके। यदि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में स्वास्थ्य संबंधी अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं। हरियाली ना केवल मानव, अपितु पशु- पक्षियों के लिए, भी अति आवश्यक है। हर कॉलोनी व सोसाइटी में पार्क होना आवश्यक है।
यदि औषधीय पौधे हो तो और भी ज्यादा अच्छा है। वृक्ष वातावरण को सुखद बनाने के साथ-साथ सकारात्मक ऊर्जा का भी संचार करते हैं। आज मानव अनेक अप्राकृतिक साधनों के बीच में रह रहा है। प्रकृति प्रदत्त हरियाली को हम अप्राकृतिक ना बनाकर इसे मूल रूप में हमारे आसपास सृजित करें, निर्मित करें। समस्त प्राणियों को जीवन देकर स्वयं के जीवन की भी रक्षा करें।
अप्राकृतिक परिवेश सर्वथा अनुचित
छाया राठी, यवतमाल
हरियाली का अप्राकृतिक परिवेश सर्वथा अनुचित है। हरियाली और वसुंधरा का तो चोली दामन का रिश्ता है। हरियाली मन को सर्वदा ही ठंडक पहुंचाती है। भारत का निसर्ग सौंदर्य पेड़ पौधो से संपन्न है। भारत की स्वर्गीय धरा को हमें प्लॅस्टिक प्रदूषण से दूर रखकर पर्यावरण संरक्षण करना चाहिये, तभी हम ग्लोबल वार्मिंग से बच सकेंगे और आने वाली पीढ़ी के लिये प्राकृतिक धरोहर संजोये रखेंगे।
हरियाली पर नंगे पाव चलने से रोगों से मुक्ति मिलती है। गाँव माटी से जुड़े थे तो हर घर मे आंगन फुलवारी होती थी, हर तरह के पेड़ पौधे पर्यावरण संतुलन रखते थे। जैसे ही हम आधुनिकीकरण की चकाचौंध में उलझ गये, सीमेंट के जंगलों से घिर गये तो हम घर को भी बनावटी पेड़, फूल-पौधो से सजा रहे, क्योंकि इनकी देखभाल नही करना पड़ती।
फ्लेट में बालकनी तो होती ही हैं, हम गमलों में तुलसी, गुलाब तो लगा ही सकते हैं। घर में रखने वाले प्राकृतिक पौधे भी मिलते हैं लेकिन देखभाल जरूरी है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्लॉस्टिक हानिकारक है, प्राकृतिक हरियाली से पर्यावरण रक्षण होकर प्राणवायु मिलेगी, ग्लोबल वार्मिंग और प्राकृतिक आपदा से बचना हो तो नवहरितिमा लगाओ। हरे भरे पौधो को देख, पंछी भी चहकते हैं व नवहरितिमा देख शगुन के गीत गुणगुनाते हैं।
हरियाली का अप्राकृतिक प्रयोग पूर्णतः अनुचित
सुनीता महेश मल्ल, आमगांव
वर्तमान स्थिति को देखकर तो लगता है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को दूषित वातावरण ही देकर जाएंगे। दूषित हवा का प्रकोप हम झेल चुके हैं। यदि कृत्रिम हरियाली की तरफ उनको मोड़ दिया तो फिर उन्हें सांसे भी कृत्रिम ही लेनी पड़ेगी।
आजकल सजावट के लिए कृत्रिम घास, कृत्रिम पुष्प, कृत्रिम वृक्ष उपलब्ध हैं जिनका प्रयोग अगली पीढ़ी के लिए कचरा रूपी कोबरा विष होगा। कृत्रिमता एक छल है, सपना है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सपना टूटने पर और छल प्रकट होने पर वह अत्यंत दुखदाई है।
यदि प्रेरणा मिले तो ठीक
कृष्ण गोपाल ईनाणी, भीलवाड़ा
हरियाली से तात्पर्य हरे-भरे वातावरण से है, जो हमारे मन को और आँखों को सुकून दे। आज शायद ही कोई होगा जो हरियाली से मुँह मोड़ ले, मानव तो ठीक पशु पक्षियों को भी हरियाली की जरुरत होती है। भले ही हरियाली उनके लिए सिर्फ पालन-पोषण का ही कारण क्यों ना हो। कोरोना के बाद से प्राण वायु ऑक्सीजन का महत्त्व सही मायने में सभी को समझ भी आया है और उसे किस तरीके से सदुपयोग करना है वो भी ज्ञात हुआ है। बहुत सारे प्रकृति प्रेमी कोरोना के पहले भी हरियाली के प्रति जागरूक थे, परन्तु कोरोना के बाद लगभग हर व्यक्ति हरियाली के प्रति कुछ ज्यादा ही जागरूक हुआ है।
यही वजह रही है कि कुछ इंडोर प्लांट्स (जैसे: स्नेक प्लांट, जेड प्लांट, मनी प्लांट आदि) जिन्हें देखना तो दूर शायद ही कभी किसी ने उनका नाम सुना था अचानक से ‘ऑक्सीजन बम’ के नाम से सुप्रसिद्ध हो गए और तो और गिलोय जैसी जंगली लता अचानक से प्राणदायी औषधी बन गयी। ये बात बिल्कुल नहीं है कि ये पौधे कोरोना के बाद से ही ऑक्सीजन देने लगे हैं अथवा गिलोय पहले औषधी नहीं हुआ करती थी, बल्कि ये तो कई सालो से अपना काम करते आ रहे हैं परन्तु कोरोना समय से ही हम मनुष्यों को इनके महत्त्व का अनुसरण हुआ। चलो देर आये पर दुरुस्त आये।
आजकल पृथ्वी पर सबसे बड़ी समस्या बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग की है, जो कि तापमान में धीरे-धीरे ही सही पर लगातार वृद्धि करती जा रही है। इसका असर हम सभी को देखने को मिल रहा है जैसे: जलवायु परिवर्तन, तापमान में औसत से ज्यादा वृद्धि, वर्षा का न होना अथवा बेमौसम वर्षा आदि। ये लक्षण हमारी पीढ़ी के लिए भले ही बहुत सूक्ष्म हों, परन्तु हमारी आने वाली पीढ़ी को इन दुष्प्रभावों को झेलना ही पड़ेगा।
हालांकि विश्व के सभी बड़े देश और संयुक्त राष्ट्र बहुत सारे कार्यक्रम जैसे: ग्लोबल वार्मिंग डे, वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे आदि मनाकर लोगों को इसके प्रति जागरूक कर रहा है। परन्तु इसके दुष्परिणाम तो समय के साथ ही पता चल पाएंगे। आजकल सामाजिक, धार्मिक कार्यक्रमों, दफ्तरों में प्लास्टिक के फूलों व पत्तों से सजावट का प्रचलन बढ़ा है, जिससे कि प्राकृतिक अनुभूति हो।
मनुष्य इन कृत्रिम सजावट को देखकर एक बार ‘अरे क्या सीन है’ कहता है, इससे अच्छी अनुभूति भी होती है और साथ ही यह विचार भी जरूर आता है कि, जब कृत्रिम चीज इतनी मनमोहक लगती है तो प्राकृतिक पौधे कितने आकर्षक लगेंगे। ऐसी सोच ही हमें हरियाली बढ़ाने का विचार देती है क्योंकि पेड़, पौधे, फूल हमें सुकून देते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
इन्हीं कृत्रिम हरियाली को देखकर मन में अगर यह विचार जागृत होता है कि हमें भी हरियाली बढ़ाने में सहयोग देना चाहिए, तो यह पर्यावरण को सुरक्षित और मनमोहक बनाएगा। अगर ये भाव हम मनुष्यो के मन में आने लगे तो ऐसे कृत्रिम पौधे जरूर लगाने चाहिए।



















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