बुजुर्गों का पैतृक गाँव छोड़कर शहर में बसना उचित अथवा अनुचित?

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पढ़-लिखकर बच्चे गांव से शहर की तरफ रचने-बसने लगे हैं, जिससे बुजुर्ग माता-पिता को भी अपने पैतृक गांव को छोड़कर बच्चों के साथ शहर में आकर रहना पड़ता है। गांव भी धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं। ऐसे में वृद्ध माता-पिता को उनके पैतृक गांव में अकेले छोड़ना बच्चों को सुरक्षित नहीं लगता है। समय के साथ बेटे-बहू, पोते-पोती तो अपनी शहरी दिनचर्या में रम जाते हैं, पर शहर में आकर बसने पर बड़े-बुजुर्गों के हिस्से में सिर्फ अकेलापन आता है। इनमें से अधिकांश बुजुर्ग शहर में आकर खुश नहीं है।

ऐसे में सामाजिक दायित्वों के सफल निर्वहन में यह चिंतनीय हो गया है कि क्या बुजुर्गों का बच्चों के साथ शहर में आकर बसने का फैसला उचित है अथवा अनुचित?आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


शहर हो या गांव; परिवार का एक स्थान पर रहना जरूरी है
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

गाँवों का समुचित विकास नहीं होने के कारण बच्चों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए शहर जाना पड़ता है और फिर बच्चे अपनी शिक्षा के अनुरूप शहर में ही अपना भावी जीवन आरंभ कर देते हैं। माता-पिता और परिवार को भी बच्चों की खुशियों की खातिर अपने पैतृक स्थान को छोड़कर शहर में रचना-बसना पड़ता है। अगर संयुक्त परिवार हो यानि परिवार बड़ा हो तो गांव में रहने वाले परिवार के अन्य सदस्यों के साथ आजीवन गांव में भी रहा जा सकता है।

पर परिवार छोटा हो तो बुजुर्गों को शहर में बच्चों के पास जाकर रहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं रह जाता है। जब तक आत्मनिर्भर हों; बुजुर्ग अपने पैतृक गांव में ही रहें और बच्चों को त्यौहार-छुट्टियों में अपने पास गांव में बुलाते रहें, इससे नई-पीढ़ी का लगाव भी अपनों से और अपने पैतृक गांव से बना रहेगा। उम्र के साथ जब बुजुर्गों के जीवन में आश्रित होने की परिस्थिति आये तब बच्चों के शहर की तरफ रुख करें।

शहर में बुजुर्ग दम्पति स्वयं को व्यस्त रखने की भरसक कोशिश करें। जीवन के अंतिम पड़ाव में नए स्थान पर बसने पर निश्चित ही बुजुर्गों को काफी परेशानियों का सामना करना होगा। ऐसे में बच्चों को अपने माता-पिता को नए वातावरण में सामंजस्य स्थापित करने में यथासंभव मदद करनी होगी।

वैसे अगर गाँव में बुजुर्ग माता-पिता कार्यरत न हों तो बच्चों के शहर में बसने के शुरुआती समय में ही उनके साथ पलायन करना उनके लिए उचित होगा क्यूंकि एक लंबे अंतराल के बाद अगर वो अपने बच्चों की शहरी दिनचर्या में प्रवेश करेंगे तो उनकी जीवनशैली के साथ तालमेल नहीं बैठा पाएंगे।

यह समय का ऐसा दौर है कि बुजुर्गों को समझदारी से स्थान परिवर्तन को अपनाना ही होगा वरना परिवार एक होते हुए भी दो भागों में विभाजित रहेगा। हमेशा एक-दूसरे की चिंता बनी रहेगी; पूरा परिवार एक स्थान पर रहेगा तो गांव हो या शहर परिवार हरा-भरा परिपूर्ण रहेगा।


जरुरी होने पर बुजुर्गों का शहर में स्थानांतरण उचित
विनोद गो. फाफट, नागपुर

आजीविका / व्यवसाय/ रोज़गार के लिए स्थानांतरण को हमारा माहेश्वरी समाज शुरुआत से ही अपनाता आया है। हमारे पूर्वज राजस्थान/ मारवाड़ छोड़ देश/विदेश की बहुतांश जगहों पर जा बसे। फलस्वरूप आज देश में हम अल्पसंख्यक (0.006%) होकर भी राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। हम जहां भी रहते हैं, अल्प समय में ही वहां का एक प्रतिष्ठित हिस्सा बन जाते हैं।

कड़ी प्रतियोगिता के इस जमाने में पढा़ई, उच्च शिक्षा, व्यावसायिक तरक्की एवं आत्म संतुष्टि के लिए स्थानांतरण जरूरी होने लगा है। इस दरमियान परिवार भी एकल तथा छोटे (1-2 बच्चे) हो गये। बच्चों का गांव में बस कुछ करना मुमकिन ना होने से शहरों में रहना उनकी मजबूरी हो गई है।

अब सिमटते छोटे परिवार को बनाए रखने के लिये माता-पिता या तो बच्चे के पास शहर आ जायें या फिर अकेले गांव में रहें इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं है। आधुनिकता की होड़ में गांव के परिचित भी व्यस्त हो गए हैं, जिसके चलते चाहकर भी आपका पूरा ध्यान रख पायेंगे या नहीं कहना मुश्किल है। अतः मेरा व्यक्तिगत मानना है कि जब तक आप सक्षम हैं, अपने पैतृक गांव में रहें, लेकिन एक निश्चित अंतराल में बच्चो के पास भी आत-जाते रह कर समय जरुर बिताये।

इससे आप भी वहां समायोजित होंगे एवं बहू व बच्चों को भी आपके संग रहने की आदत डाल पायेंगे, जिससे आप मजबूरीवश जब भी वहां स्थानांतरित हों तो प्रसन्नता से रह सकें। शहरों में आप जैसे अनेकों बुजुर्ग रह रहे हैं। उनके संग मिलकर अपना हम उम्र समूह आसानी से बना सकते हैं, जिससे अकेलापन नहीं रहेगा और असल मायने में परिवार भी बना रहेगा। वरना चाचा, मामा, बुआ, मौसी में से बहुतेरे रिश्ते समाप्ति की ओर ही अग्रसर है।


पैतृक गांव छोड़ शहर में बसना उचित नहीं
पूजा काकाणी (मध्य प्रदेश)

बुजुर्गों का पैतृक गांव छोड़कर शहर में बसना उचित नहीं है। गांव में बुजुर्गों की, कुदरत की अपनी छांव है, जिसे अपनाकर वे हर दिन, हर पल कहते हैं, यह अपना गांव है। गांव में अड़ोसी-पड़ोसी और सगे संबंधी से मिलकर, बातचीत करके बुढ़ापे में उनका मन बहल जाता है।

उसी जगह पर रहते-रहते पूरी जिंदगी गुजर जाती है। उन्हें वहां का खान पान, रहन-सहन, सगे संबंधी के साथ सुकून और आराम मिलता है। अक्सर बूढ़े लोगों के मुंह से सुना है, शहर की हलचल से दूर यहां गांव में ही हमारे मन को आराम मिलता है। घर तो अपना गांव में ही है जनाब, शहर में तो बस मकान हैं।

कई बार शहर तो अपने बच्चों के पास कुछ दिनों के लिए रहने आ जाते हैं मां-बाप। बहू-बेटे तो लगे रहते हैं अपनी दिनचर्या में बाहर नौकरी पर नोट कमाने में और पोते-पोती भी पढ़ाई और अपनी क्लासेस में रह जाते हैं। बूढ़े मां-बाप सिर्फ तन्हाई और अकेलेपन के हो जाते हैं शिकार।


समयानुकूल निर्णय ही उचित
श्रीकांत बागड़ी, नवी मुंबई

बुजुर्गों का पैतृक स्थान छोड़कर शहरों में बसना, ये विषय ही भ्रामक है। कोई भी बुजुर्ग अपना पैतृक स्थान छोड़ना, उचित या अनुचित की दृष्टि से चयन नही करता है। पारिवारिक व स्वास्थ्य की मजबूरी ही बुजुर्गों के पैतृक स्थान छोड़ने का कारण बनती है। ये सर्वविदित है कि नई पीढ़ी के युवाओं को अपने अनुरूप नौकरी हेतु अन्य स्थानों पर जाना ही होता है।

अब बुजुर्ग दंपति का एक उम्र के बाद, स्वास्थ्य की दृष्टि से, अकेला रहना उचित नही है। इस कारण उन्हें शहरों में बच्चो के पास जाने के अलावा कोई विकल्प ही नही है। इसमे यदि बुजुर्ग व्यक्ति, अपने साथी को खो चुके हैं, तो पैतृक स्थान छोड़कर संतान के पास जाकर रहना उनकी आवश्यकता है।

दूसरा, यदि बुजुर्ग आत्मनिर्भर भी है व उनके बेटा-बहु (लड़की-दामाद) दोनो कार्यरत है, एवं नाती-पोतों की देखरेख के लिए, यदि बुजुर्गों की जरूरत, संतान महसूस करती है, तो ऐसी स्थिति में भी बुजुर्गों का पैतृक स्थान छोड़कर जाना उचित है। उसमे भले ही बुजुर्गों को कुछ सामंजस्य की परेशानी हो सकती हो, परन्तु बुजुर्गों को इस कर्तव्य निर्वाहन हेतु शहरों में जाना चाहिए। अंतिम व्यवहारिक सत्य यह है कि उपरोक्त परिस्थितियों की अनुपस्थिति में, आत्मनिर्भर दंपत्तियों को अपना पैतृक स्थान कभी नही छोड़ना चाहिए।


गांव में रहना स्वास्थ्य वर्धक
राजश्री राठी, अकोला

बुजुर्गो का अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि से लगाव रहना स्वाभाविक है। गांव में अपना घर, सगे साथी, मंदिर, चौपाल हर एक जगह में जैसे खुशियां व अपनापन समाया रहता है। आस पड़ोस और साथियों का संग जीवन संध्या के दौरान संजीवनी का कार्य करता है।

इस अवस्था में आते-आते अधिकांश दायित्व पूर्ण हो जाते है और बुजुर्गो के पास अवकाश का समय पर्याप्त मात्रा में रहता है, जिससे वह अपने हम उम्र साथियों के संग समय बिताना पसंद करते है। बच्चों के साथ शहरों में जाकर बसना, उस औपचारिक नये परिवेश में ढलना, उनके लिए मुश्किल होता है और ऐसे में उनके भीतर की खुशी लुप्त हो जाती है। शहरों की व्यस्त जीवनशैली के चलते बुजुर्गों के साथ बातचीत करने का अधिक समय किसी के पास होता नहीं जिसके चलते उन्हें अकेलापन महसूस होता है और मन खिन्न हो जाता है और यह उदासी कब बीमारियों में परिवर्तित हो जाती है पता ही नहीं चलता।

शहर का वातावरण भी प्रदुषण से भरा रहता है, जिसके चलते चार दिवारी में एक खुला व्यक्तित्व सिमट कर रह जाता है। शरीर जब तक स्वस्थ रहता है तब तक बुजुर्ग गांव में रहते हुए अपने जीवन का भरपूर लुत्फ उठाएं। छुट्टियों में बच्चे अपने परिवार के साथ गांव में जाकर रह सकते हैं। व्यवस्था न होने पर या स्वास्थ्य प्रतिकूल परिस्थिति में रहने पर ही शहर का रुख अपनाएं अन्यथा खुशी से जीवनयापन हेतु गांव का जीवन ही श्रेष्ठ होगा।



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