आवश्यकता है या दबाव- समाज के लिए अति आग्रह से अर्थदान

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सामाजिक कार्यों की अर्थपूर्ति समाजजनों के आर्थिक योगदान से पूरी होती है। विभिन्न सामाजिक प्रकल्पों की पूर्ति के लिये समाज के कार्यकर्ता कई बार आग्रह से आगे बढ़कर अति आग्रह पर उतर आते हैं। इसमें उनकी सोच होती है कि यदि ऐसा नहीं करेंगे तो फंड एकत्र ही नहीं होगा। कई बार यहां अति आग्रह से अर्थदान दानदाता की अर्थव्यवस्था पर भारी भी पड़ जाता है अथवा उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।

यदि ऐसा ना हो तो भी कई बार “घोषणाबीर” दान की घोषणा कर भूल जाते हैं। ऐसे में इस विषय पर चिंतन अनिवार्य हो गया है कि समाज संगठनों के कार्यों में अति आग्रह से अर्थदान लेना आवश्यकता है अथवा दबाव? यह विषय न सिर्फ हमारे समाज बल्कि तमाम समाजसेवी संगठनों व ऐसी गतिविधियों से भी सम्बद्ध है।

अतः प्रबुद्ध पाठकों से इस चिंतनीय विषय पर विचार आमंत्रित है। आपके विचार समाजिक संगठनों को नयी राह दिखाऐंगे। समाज के इस ज्वलंत विषय पर आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।

स्वैछिक और गुप्त हो दान

विभिन्न सामाजिक संगठन वर्षभर सामाजिक कार्य करते रहते हैं। सामाजिक कार्यों के लिए तन-मन धन की आवश्यकता भी होती है। सामाजिक कार्यों में तन और मन लगाना अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। पर जब सामाजिक कार्यों के लिए धन की आवश्यकता होती है तो सामाजिक कार्यकर्ताओं को समाज-बंधुओं के घर-ऑफिस जाकर धन एकत्र करना पड़ता है। भामाशाहों के लिए अर्थदान देना आसान होता है पर मध्यमवर्गीय समाजबंधु के लिए अर्थदान यानि चंदा सरदर्द बन जाता है। ना चाहते हुए भी अपने समाज-बंधुओं को हाथ का उत्तर यानि चंदा देना ही पड़ता है।

ऐसा भी नहीं है कि दाता को सिर्फ एक ही संगठन को वार्षिक अर्थदान देना है, छोटे-मोटे कई स्थानीय संगठनों को भी वर्षभर किसी ना किसी सामाजिक कार्य में अर्थदान देना पड़ता है। मध्यमवर्गीय के लिए अति आग्रह से अर्थदान अनचाहा आर्थिक भार बढ़ाता है। हम जानते हैं कि सामाजिक कार्यों के लिए कार्यकर्ताओं को समाज से ही धन जुटाना पड़ेगा। मेरे विचार में भामाशाहों को छोड़कर मध्यमवर्गीय बंधुओं के दान-धर्म को स्वैछिक और गुप्त रखा जाए जिससे उन्हें अपने ही समाजबंधुओं के समक्ष तुलनात्मक परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

साथ ही छोटे-छोटे स्थानीय संगठन सामाजिक कार्यक्रम एकजुट होकर करें तो कार्यक्रम का व्यय घटेगा और समाज में एकजुटता बढ़ेगी। अनावश्यक सामाजिक कार्यक्रम पर भी अंकुश लगना चाहिए। एक दाता के समक्ष दूसरे दाता के अर्थदान का गुणगान और तुलना करके धन एकत्र करना संगठनों को शोभा नहीं देता। संगठनों को ऐसी गतिविधियों से बचना चाहिए।

सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव


आग्रह की स्थिति परिस्थिति पर निर्भर

यह एक कड़वी सच्चाई है कि सामाजिक कार्यों एवं प्रकल्पों की पूर्ति अधिक योगदान से ही पूरी होती है। धन संग्रह करते समय कभी-कभी दानदाताओं पर दबाव बनाने के लिए विनम्रतापूर्ण हाथ जोड़कर, अति आग्रह भी किया जाता है, ताकि दानदाताओं से अधिक दान प्राप्त हो।

कहावत है “Excess of everything is bad” यानि ‘‘आवश्यकता से अधिक किया गया हर काम वर्जित है’’। दान-दाताओं से दान लेने के समय की परिस्थिति, दाता की इच्छा, दान लेने व देने वाले के आपसी सम्बंध पर निर्भर करता है कि यह आवश्यकता है या फिर ‘‘नाजायज दबाव’’।

जयकिशन झंवर, कोलकाता


दान सदा वो ही सही-जिसके लिए मन और जेब न कहे ‘‘नहीं’’

समाज मे रहकर हम सभी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हैं जिनमें सामाजिक कार्यों हेतु अर्थदान करना एक बहुत ही अभिन्न अंग है क्योंकि समाज के तीज त्यौहार का आयोजन,सामाजिक कार्यों के क्रियान्वयन, सामाजिक उत्थान की गतिविधियाँ आदि कार्य जो सामाजिक बंधुओ के हित में किये जाते हैं उनके लिए आर्थिक सहयोग भी अपेक्षित होता है। आज प्रश्न ये है कि कितना, कब और कैसे इसकी सीमा निर्धारित की जाए? आयोजनों का स्वरूप आज विराट हो चला है, जिससे व्यय भी बढ़ गया है किंतु फिर भी अर्थदान स्वैच्छिक ही होना चाहिए।

चुनाव उचित या अनुचित

किसी दूसरे की धनराशि से प्रेरित या ऐसी कोई धनराशि जो आपकी माली हालत के प्रतिकूल हो कभी भी नही देना चाहिए क्योंकि दान सदा प्रसन्नचित्त होकर ही दिया जाना चाहिए न कि अपनी झूठी शान दिखाने और अपने ही लिए परेशानी खड़ी करने हेतु। जो व्यक्ति मन से समाज से जुड़ेगा वो अपने मन और परिस्थिति के अनुकूल सामाजिक कार्यों में मन, वचन और धन से सहयोग करेगा ही। इसलिए आज की नितांत आवश्यकता है कि व्यक्ति गुप्त दान कर अपना सामाजिक कर्तव्य निभाये क्योंकि गुप्त दान ही सही अर्थों में दान होता है और उससे किसी को हानि भी नही होती। इससे मन की भावनाएं भी आहत नही होती और कर्तव्य वहन भी स्वैच्छिक होता। अतः गुप्त दान करें और समाज में सहर्ष अपनी भूमिका निभाएं।

शालिनी चितलांगिया ‘सौरभ’, राजनांदगांव, (छत्तीसगढ़)


अति आग्रह से दान लेना सरासर गलत

समाज कार्य के लिये अतिआग्रह करके दान लेना शत प्रतिशत गलत है। इससे भावनाओं का अनादर होता है। यथा शक्ति दान जिस कार्य के लिये दान लेते हैं, वह सत्कर्म में लगता है तो गरीब से गरीब भी यथा शक्ति देता है। इनका सम्मान होना चाहिए। अति आग्रह से अर्थदान करने से नाराजगी होती है, दबाव बना रहता है। किसी भाई ने अपेक्षा से कम दे दिया तो हम गांव भर में चर्चा करते हैं, यह भी बंद होना चाहिए।

हम जानते हैं कि बगैर धन के कोई कार्य नही हो सकता। लेकिन ऐसे प्रोजेक्ट हाथ में लेना चाहिए जिसमें आम सहमती बने। केवल नेताजी की आसक्ति से प्रोजेक्ट्स नही होने चाहिए। कार्य की महत्ता समाज के हर घर तक पहुँचानी चाहिए। हमारे समाज में नये अध्यक्ष काे कुछ अलग करने की होड़ लगती है। ऐसे में दबाव में धन संग्रह करने चल पड़ते हैं। यह सिस्टम बदलना चाहिए।

अशोक तापड़िया, नासिक


दान बिना दबाब का हो

दान के लिये दबाब का कोई औचित्य नहीं। दान तो नि:स्वार्थ भाव से दी गई कोई वस्तु है। जो व्यक्ति की हैसियत पर नहीं उसके स्वभाव पर निर्भर है। अतः जो लोग किसी दवाब के चलते दान देते हैं वे अंतस से ना ख़ुश होते हैं। सिर्फ अपनी हैसियत की इज्जत रखने के लिये ही वे दूसरों के कहने पर उस वस्तु को देते हैं।

राजनीति में इसे फण्ड रूप में उचित माना जा सकता है क्यों कि देने वाले और लेने वाले दोनों की स्वार्थ पूर्ति होती है किन्तु सामाजिक परोपकारी कार्यों में दवाब से लिया पैसा उस व्यक्ति के अंतस में टीस देता है। ऐसे में यह अनुकरणीय ना होकर अनुचित ही हो जाता है। अतः सदैव दिल से दिया गया दान ही परमार्थ के कार्यों में फलित होने हेतु स्वीकार्य होना चाहिये, अन्यथा दुखी हृदय से दी कोई वस्तु सुखदायी फल नहीं दे सकती।

पूजा नबीरा, काटोल (नागपुर)


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