कोरोना सूं सीख

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खम्मा घणी सा हुक्म आपा सब देख रिया है कि कोविड सूं लड़न री सारी हदा सामने आ ग़ई हैं। आस पड़ोस में कोई बुजुर्ग मरें पड़ोसी आपरी खिड़की दरवाजा बंद कर लेवें और यूँ जतावें कि वाणे कुछ ध्यान ही नहीं। हुक्म कोरोना सूं सीख है कि सिर्फ़ इंसान ने ही नहीं आपाणै रिश्तों ने भी संक्रमित कर रियों है।

इण महामारी में आदमी रे साथे रिश्तों री भी मौत हूँ रही है। संक्रमित होते ही आपणा अजीज भी पराया हुता नजर आ रिया है।सामाजिक रिश्तो री परिभाषा ही बदलगी है। इण भयानक संकट रे दौर ने समाज री सारी विषमता चारों तरफ़ा उग आई है। जीवन जीवण र्रो मायनों बदल ग्यो है। मौत सिर्फ़ अंक गणित हूँ ग़ई है।

संवेदनाएँ मरगी है। लोगों रो असमय जाणो भी अब पथरीलें मन ने परेशान नहीं करें। सही कहूँ तो हुक्म इण संकट में आपा एक दूसरे री शारीरिक रूप सूं ही नहीं मानसिक रूप से भी दूर हूँ गया हाँ। यां लागे की कोरोना रे बाद री दुनिया तो और भयावह हुवेला।


इण शताब्दी री शुरुआत सूं आपा पाणी रे लिए लड़ रिया था। अब हवा रे लिए जंग हूँ रही है। हवा री भी कालाबाज़ारी हो रही है। दवाया ब्लैक में मिल रही है। बूढ़ा मॉं बाप अगर इण महामारी सूं बच भी ग्या तो बच्चा वाणे घर ले जावण ने तैयार नहीं है। मरने वालों रा परिजन शव लेने घरे नहीं आ रिया है।

भरापूरा परिवार होवण रे बावजूद परिवारजन रो अंतिम संस्कार लावारिस री तरह हो रियो है। अस्पताल री जगह श्मशान रो विस्तार हो रियो है। एक आत्मीय रे जाणे सूं आंसू रुके ही नही तब तक दूसरे री खबर आ जावे। लागे आपा एक बड़े श्मशान में बैठा हाँ।

हुक्म सोचने रोंगटा खड़े हूँ जावे कि तस्वीर किती भयावह हुगी है। हैदराबाद रे एक अस्पताल में कोरोना वार्ड में पैंतीस मरीज़ ठीक हूँ ग्या …पर वाणा परिजन रिश्तेदार वाणे लेवने नहीं आया, क्योंकि घर में छोटा बच्चा हैं परिवार जोखिम नहीं लेवणों चाह्वे। मथुरा रे गोवर्धन में एक बेटी बुखार रे चलते मृत पिता री अर्थी रे वास्ते कंधा देने रे लिए गुहार करती रही, बिलखती रही, मगर पड़ोसियो ने दरवाजे बंद कर लियो और तो और उन्हे पहचाण ने सूं इंकार कर दियों।

अंतत: पुलिस आई, शव रो अंतिम संस्कार करायो। लखनऊ में योंही संकट पत्रकार बिरादरी ने देखणों पड़ियों। देश रे हर हिस्से सूं ईण तरह री खबर आ रही है। सारी दुनिया ने एक कुटुम्ब मानण वालोँ भारत देश में रिश्तो पर कोरोना भारी पड़ रियो है।

आज नहीं तो काल कोरोना तो चला ही जावेला पर जो छोड़ जावेला…जिणमेँ…आपाणी प्रकृति बदल जावेली। समाज बदल जावेला। नदियाँ और वनस्पतियॉं अपना स्वभाव बदल लेवेगी। संवेदनाएँ बदल जावेला। रिश्ते बदल जावेला। आदतें बदल जावेली। पछे आख़िर बची कांई ?


महामारी ने यों सोचण ने मजबूर कर दियों है कि आज ज़रूरत अस्पताल री है या मंदिर मस्जिद ? सारी दुनिया में मंदिर, मस्जिद, चर्च बन्द हूँ ग्या। केवल अस्पताल ही खुला रिया। इन पर भी अगर आपा समझण ने तैयार नहीं हैं, तो शवो री अंतहीन यात्रा चलती रेवेला। पहाड़ सी विपत्ति रे बाद भी आपसी कटुता महामारी की तरह बढ़ रही है। बढ़ती रेवेला।

मित्रों, आपा बचा तो विचार बचेगा, जणे विचारधारा भी बचेली। पहले ख़ुद ने तो बचानो पड़ी, फिर जनतंत्र री सोच। यों वक्त आपसी तनाव रो नही है। एकजुट हुने चालण रो है। आपा प्रलय झेलियो है उने बाद मनुष्यता उठी और खड़ी हुयी।

आपा इण विपत्ति सूं भी निकळाला। मनुष्यता री जिजीविषा रों कोई तोड़ नही है। कोई भी दुख मनुष्य रे साहस सूं बड़ा नही, वही हारियो जो लड़ियों नही। इण बार री लड़ाई वैकल्पिक नहीं अनिवार्य है।

मनुष्यता ने तो इणसूं भी बड़ा संकट देखिया हैं। मनुष्यता री जीत नियति की जीत है और वो होने रेवेला मगर संवेदनाओं ने जिंदा रखने री जिम्मेदारी आपाणी खुद री है।

स्वाति जैसलमेरिया, जोधपुर


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