बच्चों को घर-परिवार से दूर भेजना कितना उचित अथवा अनुचित?

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असामाजिक तत्वों द्वारा युवाओं को निरंतर बरगलाकर गुमराह करने की घटनाएं निरंतर बढ़ती ही जा रही है। युवावर्ग का ब्रेनवॉश करके अपराधिक क्षेत्रों में धकेलना, उनके शिक्षा और कॅरियर के साथ खिलवाड़ करना जैसे षड्यंत्र दिनों-दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। अधिकांशत: यह घटनाएं घर परिवार से दूर रहकर शिक्षा ग्रहण करने वाले और कॅरियर बनाने वाले बच्चों के साथ अधिक होती है। माता-पिता और परिवार को जब तक बच्चों के अनैतिक क्रियाकलापों की खबर मिलती है, तब तक बच्चे उनकी पहुंच से बहुत दूर हो चुके होते हैं। यही वजह है कि आजकल मां-बाप का अपने संस्कारों से भरोसा उठने लगा है। जबकि दूसरी तरफ देखा जाऐ तो बच्चों का अच्छा कॅरियर व उनकी उन्नति यह भी माता-पिता का बहुत बड़ा सपना होता है, जिसके लिये वे जीवन भर की अपनी मेहनत व कमाई बच्चों पर खर्च करने के लिये तैयार रहते हैं।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या बच्चों के भविष्य के लिए बच्चों को घर परिवार से दूर भेजना उचित है अथवा अनुचित?आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


अपने संस्कारों पर भरोसा बनाए रखें
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

sumita mundra

अपने बच्चों को घर की ड्योढ़ी पार करके अपने करियर और कर्मक्षेत्र की तरफ कदम बढ़ाते देख जहां एक तरफ माता-पिता गर्वित होते हैं, वहीं दूसरी तरफ असामाजिक तत्वों के कारण भयभीत भी। दिन-प्रतिदिन हमारे आसपास इतनी अपराधिक घटनाएं देखने सुनने में आती हैं कि हमारे संस्कारों के ऊपर ही हमारा भरोसा डगमगाने लगता है।

आवश्यकता होने पर बच्चों को शिक्षा और कॅरियर बनाने के लिए स्वयं से दूर स्थान पर भेजना ही पड़ता है। असामाजिक तत्वों के कारण हम बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं कर सकते। यहीं से शुरुआत होती है, अपने बच्चों पर विश्वास करने और विश्वास को बनाए रखने की। बच्चों से निरंतर संपर्क बनाए रखें, उनकी हर छोटी बड़ी बात को सुनें और समझें, उनके स्वभाव और व्यवहार में बदलाव को अनदेखा न करें, बच्चों की परेशानी को भी हल्के में न लें।

जिस शहर बच्चों को भेज रहे हैं कोशिश करें कि वहां कोई स्थानीय अभिभावक हो, कोई दूरदराज का स्थानीय रहवासी हो तो भी उससे संपर्क बनाएं और अपने बच्चे को भी उसके साथ संपर्क में बनाए रखें। बच्चों को दूसरे शहर में भेजने के पूर्व उनसे इन सभी मुद्दों पर भी खुलकर बात करें।

बच्चों को आश्वस्त करें कि अगर वो किसी भी मुसीबत में फंस जाए तो उनके माता-पिता ढाल बनकर उनके साथ रहेंगे। बच्चों पर निरंतर पारिवारिक मूल्यों और जिम्मेदारियों का अहसास बनाए रखें। बच्चों की शिक्षा और कैरियर के लिए समझौता न करें। बच्चों को उड़ने के लिए खुला आसमान दें, पर सतर्क रहें कि उनकी उड़ान आंखों से ओझल भी न हो।


बच्चों में विकसित करें सही सोच
राजकुमार मूंधड़ा, मालेगांव

दुनिया की हर बात के दो पहलू होते है सकारात्मक और नकारात्मक। बच्चो को घर से दूर भेजना चाहें, वो उच्च विद्या ग्रहण के लिए हो या आजीविका के लिए अपने तो संस्कारों पर तो भरोसा रखना ही चाहिए। जब तक वह आपके पास है, उसे इतना काबिल बनाइए कि उसे अच्छाई और बुराई का अंदाज हो।

यह आवश्यक नहीं है कि जब बच्चा आपसे दूर है तभी वह गलत दिशा की तरफ बहकेगा। अगर उसको गलत राह पकड़नी होगी तो वह आपके साथ रहकर भी पकड़ लेगा। घर से दूर रहकर उसमे जो सर्वांगीण विकास होना है वो अभिभावक की छत्रछाया में रहकर नहीं हो पाएगा। बच्चों में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता का विकास भी घर से दूर रहकर ही होता है।

अभिभावकों को बच्चों की दिनचर्या की जानकारी रखना ज़रूरी है। हमारे आसपास गैर सामाजिक तत्व तो हमेशा अनादिकाल से चलते आए है,पर हमें उसकी भेंट नही चढ़ना है। इसका अंदाज उन्हें खुद हो जाए, ऐसी मानसिकता हमारे बच्चों में होनी चाहिए।


सही उम्र में ही बाहर पहुँचाना उचित
नीरा मल्ल, पुरुलिया

हमेशा माता पिता की मनसा यही होती है, कि बच्चे उनकी आखों के सामने ही रहें। बचपन से जवानी के बीच के नाजुक पल में उनको ऊंच नीच की शिक्षा देते रहते है। समय की मांग और भविष्य को उज्वल बनाने हेतु दिल की ना सुनकर माता-पिता दिमाग की सुनते हैं, क्योंकि बच्चों को जमाने के साथ कदम से कदम मिलाने के लिए बाहर भेजना जरूरी हो जाता है।

अब हमेशा यह चिंता सताए रहती है, कैसे होंगे, ठीक से अपने हॉस्टल पहुंच गए क्या? यहां तक कि कई बुरे ख्याल भी आते है। उनके साथ कोई अनैतिक कार्य तो नहीं हो रहा है? इसलिए किसी ना किसी बहाने बच्चो से संपर्क करते रहते हैं। बच्चे आत्मनिर्भर बनें और अपनी सुरक्षा स्वयं करें, इसलिए यह जरूरी है। छोटे शहरों में उच्च शिक्षा की असमर्थता,फिर नौकरी की कमी, आज कल पढ़ाई के क्षेत्र इतने सारे है, कि उसके अनुसार बच्चो को अलग अलग दिशाओं में जाना होता है।

जिनका खुद का व्यापार या फैक्ट्री हो उनके बच्चे अगर उसी क्षेत्र की उच्च शिक्षा ले कर अपने पैतृक व्यवसाय में शामिल हों तो फिर से वे अपने घर में रह लेंगे। लेकिन जिनको आगे जॉब ही करना है, उनके लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं है। फिर भी यह बिल्कुल उचित नहीं कि क्लास 4-5 से बच्चो को दूर भेजें। वे बच्चे घर परिवार से और अपनी संस्कृति से भी दूर हो जाते है। 10th के बाद बाहर भेजने के लिए जब तैयार करें, साथ-साथ अपनी संस्कृति और संस्कार समय समय पर बच्चो को सिखाए तो बचपन की शिक्षा हमेशा याद रहती है। उससे कम से कम जो बच्चे भटक जाते हैं उन्हें अपने नैतिक मूल्य याद दिलाने से याद आ जाएंगे।


आवश्यकता अनुरूप निर्णय सही
सुरेन्द्र बजाज, जयपुर

इस विषय में सवाल उचित- अनुचित का नहीं है, सवाल है घर परिवार से दूर भेजने की कितनी आवश्यकता है? बच्चों को अच्छे कॅरियर व उनकी उन्नति के लिए यदि वाकई बाहर भेजने की आवश्यकता है तो फिर उचित अनुचित का प्रश्न गौण हो जाता है। हमारे बच्चे में वे जरूरी संस्कार मौजूद है, जो उन्हें घर से बाहर रहने पर क्या सही और क्या गलत है का मार्गदर्शन देते रहेंगे।

साधारणतया यह तो निश्चित है कि घर से बाहर जाकर अकेला रहने वाला बच्चा अपना भला बुरा सोच सकता है। उस परिस्थिति में यह कहना मुश्किल है कि जिस उद्देश्य से वह बाहर जा रहा है उसमें उचित – अनुचित का निर्णय करना कितना प्रासांगिक है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि आधुनिक युग चाहे कितना भी आगे बढ़ गया हो बेटे-बेटी को बाहर रहने को एक ही तराजू पर तौलना जोखिम भरा कदम है। उनके साथ इस दौरान कोई अनचाही घटना घटने पर हम सामान्य प्रतिक्रिया नहीं दे सकते।


पारिवारिक पृष्ठभूमि अनुसार निर्णय उचित
ममता लखानी, नापासर

वर्तमान समय है परिवर्तन का। आज के युग में चाहे लड़का हो या लड़की अपने पैरों पर खड़े होकर कुछ ना कुछ करने को सदैव आतुर रहते हैं। ऐसे में कुछ परिवारों का तो व्यवसाय होता है जिसमें बच्चे कुछ नया कर सकते में सक्षम होते हैं परंतु नौकरी पेशा लोगों को जो अपने बच्चों का करियर बनाने को आतुर होना पड़ता है।

अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा प्राप्ति के लिए घर से बाहर भेजने को मजबूर भी हो जाते हैं। ऐसे में बच्चों को शिक्षा के लिए घर से बाहर भेजना उचित या अनुचित यह निर्भर करता है उनके परिवार की पृष्ठभूमि पर। यदि घर का व्यवसाय है तो अच्छा होगा उसी में ही आगे बढ़ाएं अन्यथा नौकरी की चाह में अच्छी शिक्षा प्राप्ति के लिए घर से जाना आवश्यक ही हो जाता है।


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