आत्मचिंतन करते चलो

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उम्र के अंतिम दौर में जाकर यह पछतावा न हों कि जीवन में स्वयं कभी अपना आत्म विश्लेषण नहीं कर सके कर लेते तो शायद जीवन को और बेहतर बना सकते, इसके लिये बहुत आवश्यक है कि हम सदैव आत्मचिंतन करें।

हरिवंशराय बच्चन जी की प्रसिद्ध कविता है-

जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें भला बुरा क्या।

उम्र छोटी हो या बड़ी व्यक्तित्व के विकास के लिये यह बहुत जरूरी है कि हम अपना आत्म परीक्षण करें। छोटे-छोटे अंतराल से स्वयं यह जानने की कौशिश करें कि मैं जीवन में क्या चाहता हूँ? जो मैं चाहता हूँ उसे पाने के लिये क्या-क्या करने की आवश्यकता है? मैं क्या-क्या कर रहा हूँ, क्या मुझसे छूट रहा है? जो छूट गया है उसे अब कैसे अपनी दिनचर्या में जोड़ना है। उसके लिये किन-किन छोटे-बड़े प्रयत्न की आवश्यकता है? आत्म अवलोकन कर व्यक्ति अपनी पुरानी गलतियों को समझ बहुत कुछ सीखता हैं अपने रास्ते को नया मोड़ देने की सद्बुद्धि उसमें पनपती है।

महात्मा बुद्ध ने कहा था, व्यक्ति जितना आत्म-चिंतन से सीखता है उतना किसी बाहरी साधन से नहीं सीख सकता। जीवन को प्रकाशित करने के लिये हमें अपना दीपक स्वयं बनना पड़ता है। अर्थात् आत्म चिंतन और आत्म अवलोकन द्वारा अपने बुद्धि बल से अपने को बेहतर ढंग से निखारा जा सकता है।

आत्म चिंतन की आदत अन्य अच्छी आदतों की तरह बचपन से डलनी चाहिए। लालन पालन के समय पालकों को चाहिये कि वे अपने बच्चों पर अपने निर्णय जबरदस्ती लादें नहीं वरन विस्तारपूर्वक अपने निर्णय उन्हें समझावें। उन्हें खुद विश्लेषण करने को कहें? विश्लेषण कैसे करना है यह उन्हें बतायें और फिर इस प्रकार अपनी ही कमियों और गलतियों से सबक सीखते हुए आगे की सही राय चुनने और उस पर भी सदा चिंतन करने की प्रबल प्रवृत्ति विकसित होने दें।

युवावस्था में तो आत्मचिंतन और आत्मअवलोकन आपके सर्वांगीण विकास के लिये सबसे अधिक जरूरी है।

बुजुर्ग पाठक सोच रहे होंगे कि जीवन भर नहीं किया तो अब इस दिशा में सोच कर क्या फायदा। जी नहीं, अब तो यह आपके बुढ़ापे की सक्षम लाठी बनेगा। आत्म चिंतन स्वभाव की अनेकों कमियों को दूर भ्गाते हुए आपको हिम्मती बनाता है। वृद्धावस्था में आये हुए नैराश्य पर आप इससे अंकुश लगाते हुए परिस्थितियों के अनुरूप अपने आपको बड़ी आसानी से ढ़ालते हुए शांतिमय जीवन जी सकते हैं।

अत: नियमित रूप से समयानुसार आत्म-चिंतन करते रहिये, स्वयं अपने गुरु बनते रहिये।


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