वृध्दाश्रम- संस्कृति व समाज पर कंलक

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वृध्दाश्रम पाश्चात्य संस्कृति की देन है जो धीरे-धीरे हमारे समाज में अपनी जगह बड़ी तेजी से बनाता जा रहा है। हम अपनी पुरानी संस्कृति, धर्म, इंसानियत से दूर होते जा रहे हैं। हमारी संस्कृति में माता-पिता की जगह भगवान से भी उपर है। संयुक्त परिवार में दादी-दादा, काका-काकी, माता-पिता भाई-बहन से सुख दुख में प्रेम से साथ रह कर अच्छी बातें सीखते-सीखते संतान बड़ी होती थी। चाहें इसे आधुनिक सोच वाले कितना भी अच्छा कहें लेकिन यह संयुक्त परिवारों का ही नहीं बल्कि सामान्य परिवारों का भी विग्रह करने वाला संस्कृति व समाज का कलंक है।


एकल परिवारों का जन्म

संयुक्त परिवारों में रहते रहते कुछ सदस्यों के दिलों में आजाद रहने का खयाल आने लगा। संयुक्त परिवार में रहना उन्हें बोझ लगने लगा। उनमें धीरे-धीरे सहनशक्ति कम होने लगी और अहंकार, स्वार्थ व लोभ बढ़ने लगा। वर्तमान में परिवार की परीभाषा माता-पिता व उनके बच्चे बन कर रह गई है।

समय बदला, मंहगाई बढ़ी और उच्च शिक्षा का चलन शुरु हुआ। संयुक्त परिवार व काम-धंधों की बातें पुरानी होने लगी। अब परिवार मे बस माता-पिता व एक दो बच्चे होने लगे हैं। माता-पिता बचपन से अपना सब कुछ लुटाकर अपने बच्चों की हर सही-गलत, अच्छी-बुरी फरमाइशों को पूरी कर पैसों से उनकी खुशियाँ खरीद कर देने लगे हैं।

बच्चे बचपन से ही बड़ों व अपने माता-पिता से झूठ बोलने लगे हैं। उनमें सहनशक्ति कम होने के साथ साथ ज़िद, अहंकार और आज़ादी की भावना भी आने लगी है। उन्हें अब रोक-टोक व बंधन स्वीकार नहीं है। कसूर सिर्फ संतान का नहीं है अपितु सामाजिक वातावरण ही दूषित होने लगा है।

जैन मुनि तरुणसागरजी कहते हैं- “संतान को लायक बनाओ पर इतना लायक भी मत बनाओ की वह आपको ही नालायक समझने लगे।”


संस्कारों में कमी

आज की पीढ़ी में माता-पिता से ज़्यादा पढ़े-लिखे व ज़्यादा आमदनी के कारण उनमें अहंकार आ गया है। बूढ़े होते माता-पिता अब उन्हें बोझ लगने लगे हैं। वे यह भूल गए हैं कि एक दिन उन्हें भी बूढ़ा होना है।

वृध्दाश्रम

UNO के एक सर्वे के अनुसार भारत बुज़ुर्गों के रहने लायक नहीं है। डेमोग्राफी में भारत अभी युवाओं का देश है व अगले 15-20 सालों मे सीनीयर सिटीजन्स की संख्या तेजी से बढ़ेगी।

गाँवों में अभी भी सिनीयर सिटिज़न्स संयुक्त परिवार मे रहते हैं परंतु शहरों में नवीनीकरण, नौकरी व पढ़ाई-लिखाई के कारण बच्चे माता-पिता से दूर रहते हैं।


बुजुर्गों को भौतिक साधन नहीं, अपनापन, प्रेम चाहिए

देश में ज्यादातर बुज़ुर्ग अकेलेपन के शिकार हैं। कुछ सामाजिक संस्थाएं वृध्दाश्रम जाकर कपड़े,कंबल,मिठाई व खाना बांटने से अपना फ़र्ज़ पूरा हो गया यह समझती है। वे भौतिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक व सामाजिक गरीबी से पीड़ित हैं।

उम्र के इस अंतिम पड़ाव में उन्हें समाज से हमदर्दी नहीं बल्कि थोड़ा समय व अपनापन चाहिए। हमारे धर्म में मातृ ऋण, पितृ ऋण व समाज ऋण की बात कही है पर यहाँ बूढ़े-बुजुर्गों की स्थिति अत्यंत दयनीय है।


अपनी ज़िम्मेदारी पर करें चिंतन

वृध्दाश्रम

वृद्धाश्रम की संस्कृति हमारी संस्कृति पर कलंक है और इसके लिए समाज का हर वर्ग कहीं ना कहीं दोषी है। दोष सिर्फ आज के बच्चों का नहीं बल्कि हम सबका है। समय आ गया है की हम उनकी सुरक्षा व देखरेख की ज़िम्मेदारी उठाएं।

आज की इस भाग-दौड़ भरी दिनचर्या में उनके लिए थोड़ा समय निकाल कर, उनके पास बैठकर बात करने से उनकी शारिरिक व मानसिक स्थिति अच्छी रहेगी और साथ ही वे अकेलेपन के शिकार भी नही होंगे।

वृद्धों की देखभाल करना समाज का दायित्व है और साथ ही अपने बुज़ुर्ग माता पिता की देखभाल करना संतान का दायित्व है।

शरद गोपीदासजी बागड़ी

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