अपनी बेटी को अपना जीवन सहारा बनाना उचित अथवा अनुचित?

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आज भी माता-पिता अपनी बेटी को अपने जीवन का सहारा बनाने से कतराते हैं। परिवार और समाज क्या कहेगा यह सोच-सोचकर घबराते हैं। हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं, बेटे और बेटी की परवरिश में समानता ले आयें पर अगर किसी दम्पति को बेटा ना हो अथवा किसी कारणवश बेटा अपने माता-पिता की देखभाल ना कर पाये तो भी जिस बेटी को माता-पिता ने काबिल बनाया, अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया, सुसंपन्न घर में विवाह किया, उस बेटी के ऊपर निर्भर रहना आज भी माता-पिता को मंजूर नहीं है।

यह हमारी संस्कृति है या मानसिक विचारधारा कि अधिकांश माता-पिता चाहकर भी बेटी पर अपना बोझ नहीं डालना चाहते। एक मान्यता के अनुसार इसे पाप समझा जाता है, जबकि सुधारवादी लोग इसे मात्र हमारी रूढ़िवादी सोच मानते है। ऐसे में यह विचारणीय हो गया है कि अपनी बेटी को अपना जीवन सहारा बनाना उचित है या अनुचित? आइये जानें इस स्तम्भ की प्रभारी सुमिता मूंदड़ा से उनके तथा समाज के प्रबुद्धजनों के विचार।


सामंजस्य और समझदारी से परिवर्तन संभव
सुमिता मूंधड़ा, मालेगांव

सुमिता मूंधड़ा

आज बेटे और बेटी की परवरिश में समानता देखने को मिलती है। बेटियां पढ़-लिखकर दहलीज के अंदर ही नहीं दहलीज के बाहर भी अपनी पहचान बना रही हैं। यह तभी संभव हो पाया है जब बेटियों को तन-मन-धन से माता-पिता द्वारा हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का पूरा सहयोग मिला है। जब बेटियां भी बेटों के समान माता-पिता से सहयोग लेने का अधिकार रखती हैं तो उन्हें अपने माता-पिता का सहारा बनने का पूरा अधिकार भी होना ही चाहिए।

अगर बेटी कमाऊ ना भी हो तो दामाद को आगे बढ़कर पुत्र का फर्ज निभाना चाहिए। कोविड में बहुत से माता-पिता नितांत एकाकी जीवन जीने के लिए विवश रहे, पर उन्हें अपनी पुत्रियों के पास जाने से अथवा उनसे सहायता लेने से कतराते हुए मैंने देखा है। इसका कारण है, उनकी परंपरागत रूढ़िवादी सोच और सामाजिक बंधन जिसमें अब वक्त के साथ बदलाव की आवश्यकता है।

समाज को भी अपनी सोच बदलकर व्यवहारिक बनना होगा। समाज को आगे बढ़कर खुलकर इस बात का प्रचार-प्रसार करना होगा कि बेटी के घर का अन्न-धन प्रयोग करने से माता-पिता कभी पाप के भागी नहीं बनते हैं, यह ईश्वर द्वारा नहीं बल्कि मानवमात्र द्वारा बनाये गए नियम हैं।

कुछ बेटियां चाहकर भी संयुक्त परिवार अथवा किसी विशेष कारणवश अपने माता-पिता की सीधे तौर पर मदद नहीं कर पाती हैं, पर उनका सहारा बनने की अन्य राहों को अपनाकर माता-पिता के जीवन को आसान बना सकती हैं। जब बेटी घर-गृहस्थी के साथ दफ्तर-कार्यालय के बीच आसानी से तालमेल बैठा सकती हैं तो अपने ससुराल और पीहर के बीच सामंजस्य बनाकर बहू के साथ-साथ बेटी की जिम्मेदारी भी आसानी से निभा ही सकती हैं।


उचित तो है पर स्वयं की वित्त व्यवस्था भी जरूरी
कपिल करवा, संगरिया

समय के साथ-साथ संतान की संख्या कम होना नई जीवनशैली का हिस्सा हो गया है। बहुत बड़ी संख्या में परिवार ऐसे भी हैं जो एक या दो बेटी के बाद पुत्र का प्रयास नही करते। माता-पिता जब संतान की परवरिश में भेदभाव नहीं करते तो भविष्य के दायित्व के लिए भी समान जिम्मेदारी दोनो की रहनी तय है।

पुत्र के नही होने या सेवा नहीं करने पर अपनी बेटी को सहारा बनाना हर तरह से उचित है। वैसे बदलाव के प्रथम दौर में प्रत्येक इंसान वर्तमान के साथ-साथ बुढ़ापे के लिए आर्थिक रूप से सक्षम रहें तो वह बेटे या बेटी किसी के भी साथ रहे कम चिंता और परेशानी का सामना करना पड़ता है।

सामाजिक ढांचा भी यही कहता है कि बेटों के मुकाबले बेटियां माता-पिता के साथ भावनात्मक रूप से अधिक जुड़ाव रखती है तो उनके साथ रहना अब स्वीकार्यता में आना सामान्य बदलाव मात्र है और कुछ नही। समाज की सोच समय के बदलाव के अनुरूप अपने आप धीरे धीरे बदलती रहती है।


ससुराल व मायके में सामंजस्य जरूरी
भारती सुजीत बिहानी, सिलीगुड़ी

पुराने जमाने में बेटी को पराया धन एवं बेटे को कुलदीपक समझकर परवरिश की जाती थी। बेटी के ससुराल का पानी पीना भी मंजूर नहीं था। क्योंकि बेटियां खुद आर्थिक रूप से पति पर निर्भर रहा करती थी एवं अपने ससुराल में ही सेवा प्रदान करती थी।

उनकी अपनी आमदनी का कोई जरिया नहीं था। मगर आज के युग में पुत्र और पुत्री की समान रूप से परवरिश की जाती है। हर क्षेत्र में बेटियों ने अपना परचम फहरा कर यह साबित भी कर दिया है कि वह बेटों से कम नहीं है। आर्थिक रूप से वो आत्मनिर्भर है। ससुराल में बहू का फर्ज निभाने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर अपने मां-बाप की देखभाल भी बखूबी कर सकती हैं।

हमारे समाज में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। पुत्री द्वारा माता-पिता की देखभाल करना पाप नहीं बल्कि एक सराहनीय पहल है। जिसे आपने पढ़ा -लिखा कर काबिल बनाया एवं अपने पैरो पर खड़ा रहना सिखाया, जरूरत पड़ने पर वह आपकी देखरेख, आर्थिक सहायता एवं मान-सम्मान प्रदान करती है तो उस पर गर्व करना चाहिए साथ ही इतना ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि वह आप की देखभाल करते-करते सास-ससुर को नजर अंदाज़ ना करें। ससुराल एवं पीहर का सामंजस्य रखकर अगर बेटी अपने माता-पिता के बुढ़ापे का जीवन सहारा बनती है तो कोई बुराई नहीं बल्कि पुण्य का कार्य करती है।


न करें बेटे-बेटी में फर्क
नृसिंह करवा ‘बन्धु’, जोधपुर

कहा जाता है कि बेटी पराया धन होती है। पर अब बदलते दौर में यह बात कुछ हद तक अप्रासंगिक होती हुई नजर आ रही है। जिस कालखंड में इस कहावत का प्रादुर्भाव हुआ, उस समय सीमित सोच से लड़कियां महज घर की चार दिवारी (बाबुल का घर हो या पीया जी का आंगन) की शोभा और जवाबदारी समझी जाती थीं।

चूँकि अब परिस्थितियां बदली है। संसाधन ओर विकल्प भी असीमित उपलब्ध हैं, तो बेटियों को खुला आसमान मिला है, जिसका उपयोग वो खूब कर रही है। अब तो वो घर की देहरी से निकल उच्य शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन को, अपनी सोच के स्तर को ऊंचा उठाकर लड़को ओर लड़कियों का भेद भी खत्म कर रही हैं।

अब अगर वो सक्षम होकर अपने माता-पिता का सहारा बनती है तो इसे खुले मन से स्वीकारा जाना चाहिए। अगर बेटों में अपना भविष्य ढूंढा जाना गलत नही है तो बेटियों के बूते अपने सपने साकार करने के प्रयत्न भी गलत नही हो सकते। आखिरकार बेटे हों या बेटी, दोनो मां की एक ही कोख से ही तो इस दुनिया में आये हैं।


माता पिता बेटियों की भी जिम्मेदारी
कुमकुम काबरा, बरेली

भारतीय परिवार व समाज में बेटे का कर्तव्य समझा जाता है कि वह अपने माता-पिता की वृद्धावस्था में उनका सहारा बने। पुरातन काल में रूढ़िवादी होने के कारण माता-पिता अपनी बेटी के घर का पानी भी नहीं पीते थे। समाज व परिवार के कारण बेटी को अपना जीवन सहारा बनाने में कतराते हैं।

संस्कृति व मानसिक विचारधारा के कारण माता-पिता बेटी पर बोझ डालना नहीं चाहते हैं। परिवार व समाज मे सभी बातो पर महिलाओं मे इतने परिवर्तन आने के बाद भी कुछ महिलाये बहुत रूढ़ीवादी हैं। कानूनी तौर पर बेटी को अपने माता पिता को रखने व सेवा करने की जिम्मेदारी है।

आधुनिक समय में बेटा-बेटी दोनों ही बराबर समझे जाते हैं। बेटों से ज्यादा ममता बेटी मे होती है। बेटी अपने सास-ससुर को रख सकती है तो वह अपने माता-पिता को भी रख सकती है। जब समाज एवं परिवार समझने लग जायेगा कि माता-पिता की देखभाल बेटी भी कर सकती है, उस दिन समाज से कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियां भी मिट जाएंगी। मेरे विचार से बुजुर्ग माता-पिता का पालन पोषण बेटी को भी करना चाहिये।


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