हंसी कहाँ खो गई?

Date:

एकाकीपन या एकरस जीवन दोनों के मायने लगभग एक ही हैं, खुशियों से विहीन जिंदगी। बदलते दौर और उस पर भी कोरोना की मार ने जीवन से हँसी छीन ली है।


जीवन एकरस हो चला है। एकरस माने एक-रस। हमारे भोजन में छ: रस होते हैं, जिसमें मीठा, खट्टा, खारा, तीखा, चटपटा, कषाय सभी शामिल हैं। लेकिन कोई हमें कहे कि केवल मीठा ही खाना है या केवल तीखा ही खाना है तो बहुत मुश्किल हो जाती है। लेकिन इन दिनों यही हो रहा है, केवल घर पर रहो। सारी दुनिया से कटकर रह गये हैं, लिखने को भी नया कुछ मिलता नहीं।

जिन परिवारों में कई लोग रहते हैं, वे भी घर से बाहर निकलने को तड़प रहे होते हैं तो हम जैसे दो-जन तो एकरसता से पगला गये हैं। कहा तो यही जाता है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है लेकिन समाज ही दिखायी नहीं दे रहा है। समाज तो दूर की बात है परिवार ही पहरे में बन्द हो गये हैं। किसी से भी बात करो तो वह कहता मिलेगा कि मानसिक तनाव का अनुभव कर रहे हैं और अवसाद में जी रहे हैं।


कल तक हम समाज से पीछा छुड़ा रहे थे, आज समाज को तलाश रहे हैं। जिस घर में भी झांक लो, वहीं अकेले पति-पत्नी मिल जाएंगे। बच्चे या तो पढ़ने चले गये हैं या फिर नौकरी के कारण दूसरे शहर या विदेश चले गये हैं। प्रत्येक व्यक्ति अकेलेपन का शिकार हो रहा है। कोई कह रहा है कि रात को नींद की गोली खानी पड़ रही है, कोई कह रहा है कि बस रोना ही रोना आता है।

जहाँ परिवारों में रोज कलह होती थी, लोग अलग घर बसाने को बेताब रहते थे, आज वही लोग, लोगों के लिये तरस रहे हैं। इतनी बड़ी जनसंख्या है लेकिन आदमी-आदमी के लिये तरस रहा है। त्योहार आते हैं लेकिन बदरंग से चले जाते हैं। एकरसता के कारण लोग बीमार हो रहे हैं, कोई उच्च ब्लड प्रेशर से तो कोई डाइबिटीज से।

कैंसर भी खूब सुनाई दे रहे हैं। सारे ही रोग हार्मोन्स के कारण हो रहे हैं। कहीं आक्रोश नहीं निकल रहा है तो कहीं प्रेम…। बातें तो मन में घुटकर रह गयी हैं और जीभ तालू में चिपक गयी है। जिन परिवारों में वर्क फ्रॉम होम के कारण बच्चे घर पर हैं, वहाँ भी एकरसता बढ़ रही है। वहाँ से भी आवाज आ रही है कि ऑफिस कब जाओगे?


हो सकता है कि यह मेरा अनुभव हो, आपका नहीं हो। लेकिन कइयों का तो है। मन अंधेरों के बीच छिपता जा रहा है। हँसना तो जैसे भूल ही गये हैं। मुझे याद नहीं आ रहा है कि यह हँसी मेरे जीवन में कब आयी थी? वही मैं हूँ.. जिसे लोग पूछते थे कि आप इतना हँसती कैसे हैं? शायद सभी को लोग पूछ रहे हैं कि हँसी कहाँ गयी? हमारे पुराण कहते हैं कि पहले लोग संन्यास लेकर जंगल में चले जाते थे, जंगल मतलब प्रकृति के पास।

वे प्रकृति से जुड़ जाते थे, लेकिन आज हम किसी से जुड़ नहीं पा रहे हैं, बस टूट रहे हैं। अकेलेपन की चाह नें हमें कितना लाचार बना दिया है, यह इस विपत्ति काल में समझ आने लगा है। यह बात भी गौर करने की है कि केवल उम्रदराज लोग एकरसता का अनुभव नहीं कर रहे हैं, यह समस्या सभी के जीवन में आ गयी है।

जिस किसी की उम्र 50 को पार कर गयी है, वह एकाकी होता जा रहा है। यदि परिवार में भी है तो वह रस नहीं है। सब साथ रहकर, गप मारते हुए कोई नहीं दिखता।


पहले शाम होती थी, छत की डोली पर या बंगले की डोली पर बैठकर लोग आस पड़ोस से गप लगाते थे। घर वाले एक साथ उठते-बैठते थे। लेकिन अब वैसा कुछ नहीं है। मेरे पड़ोस में अनहोनी भी हो जाए तो पता नहीं लगता। सब बस सिमटकर रह गये हैं। दुनिया पर आया संकट कम हुआ है लेकिन डर जमा हुआ है।

यही डर सभी के मन में पैर पसारकर बैठ गया है। इस डर ने सारे ही रस फीके कर दिये हैं। महामारी से तो हम बच गये हैं लेकिन इस डर से कैद हुए हम जैसे करोड़ों लोग एकरसता का शिकार हो गये हैं। पहले हर फोन कोरोना की खबर देता था और अब दूसरें रोगों की। कुछ तो करना होगा जीवन में, नहीं तो मानसिक अवसाद के रोगी बढ़ते ही जाएंगे। ढूंढनी होगी हँसी को, जो न जाने कहाँ खो गयी है।

मधु ललित बाहेती, कोटा


Sri Maheshwari Times
Sri Maheshwari Times
Monthly Maheshwari community magazine connecting Maheshwaris round the globe.

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

Sri Maheshwari Times- March 2026 Edition

Check out Sri Maheshwari Times March 2026 'Mahila Visheshank'...

Varshika Gaggar को अमेरिका मे गोल्ड मेडल

नागौर। स्व. श्री महादेवजी एवं स्व. श्रीमती गीता देवी...

Sri Maheshwari Times- February 2026 Edition

Check out Sri Maheshwari Times February 2026 Edition on...

Ashva Ratna Mudra for Concentration

अश्व रत्न मुद्रा (Ashva Ratna Mudra) का अभ्यास एकाग्रता...