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वरिष्ठावस्था की सबसे बड़ी समस्या स्लिप डिस्क

स्लिप डिस्क वृद्धावस्था की ऐसी बीमारी के रूप में जानी जाती है जो रोगी को चलने-फिरने तक का मोहताज कर देती है। वैसे वर्तमान की अनियमित दिनचर्या के कारण युवा वर्ग भी इससे प्रभावित होने लगा है। यदि दिनचर्या सही रहे तो युवावस्था तो ठीक वृद्धावस्था में भी इससे बचा जा सकता है। आइये देखें कैसे?

स्लिप डिस्क भी वृद्धावस्था की बीमारियों में से एक प्रमुख बीमारी है। वास्तव में देखें तो यह बीमारी है ही नहीं, बल्की शरीर की कमज़ोरी की वजह से उत्पन्न हुई समस्या है। स्पाइनल कॉर्ड की हड्डियों के बीच कुशन जैसी एक मुलायम चीज़ होती है, जिसे डिस्क कहा जाता है। ये डिस्क एक दूसरे से जुड़ी होती है और वर्टिब्रा के बिलकुल बीच में स्थित होती है जो शॉक एब्जॉर्बर का काम करती है।

वास्तव में स्लिप डिस्क नहीं होती, बल्कि इसमें स्पाइनल कॉर्ड से ककुछ बाहर को आ जाती है। डिस्क का बाहरी हिस्सा एक मजबूत झिल्ली से बना होता है और बीच में तरल जैलीनुमा पदार्थ होता है। डिस्क में मौजूद जैली या कुशन जैसा हिस्सा कनेक्टिव टिश्यूस के सर्कल से बाहर की ओर निकल आता है और आगे बढ़ा हुआ हिस्सा स्पाइन कॉर्ड पर दबाव बनाता है।

कई बार उम्र के साथ यह तरल पदार्थ सूखने लगता है या फिर अचानक झटके या दबाव से झिल्ली फट जाती है या कमज़ोर हो जाती है तो जैलीनुमा पदार्थ निकलकर नसों पर दबाव बनाने लगता है, जिसकी वजह से पैरों में दर्द या सुन्न होने की समस्या होती है।


कैसे पहचाने इसे

सामान्यतः यह परेशानी है या नहीं इसका अंतिम निष्कर्ष तो डॉक्टर ही दे सकता है। फिर भी इसके कुछ लक्षण ऐसे हैं, जिससे इसे पहचाना जा सकता है।

इनमें नसों पर दबाव के कारण कमर दर्द, पैरों में दर्द, एड़ी या पैर की अंगुलियों का सुन्न होना, पैर के अंगूठे या पंजे में कमजोरी, स्पाइनल कॉर्ड के बीच में दबाव पड़ने से कई बार हिप या थाईज के आसपास सुन्न महसूस करना, समस्या बढ़ने पर यूरिन-स्टूलपास करने में परेशानी, रीढ़ के निचले हिस्से में असहनीय दर्द, चलने-फिरने, झुकने या सामान्य काम करने में भी दर्द, झुकने या खांसने पर शरीर में करंट सा महसूस करना आदि इसके सामान्य लक्षण हैं।


क्यों होती यह समस्या?

डॉक्टरों के अनुसार इस समस्या की उत्पत्ति जॉइंट्स के डीजेनरेशन, कमर की हड्डियों या रीढ़ की हड्डी में जन्मजात विकृति या संक्रमण अथवा पैरों में कोई जन्मजात खराबी या बाद में कोई विकार पैदा होने से होती है। फिर भी देखें तो इन कारणों की उत्पत्ति के मूल में भी हमारी कुछ सामान्य गलतियां है।

गलत पोस्चर इसका आम कारण है। लेटकर या झुककर पढ़ना या काम करना, कंप्यूटर के आगे बैठे रहना इसका प्रमुख कारण है। अनियमित दिनचर्या, अचानक झुकने, वजन उठाने, झटका लगने, गलत तरीके से उठने-बैठने की वजह से दर्द हो सकता है।

सुस्त जीवन शैली, शारीरिक गतिविधियां कम होने, व्यायाम या पैदल न चलने से भी मसल्स कमज़ोर हो जाती है। अत्यधिक थकान से भी स्पाइन पर ज़ोर पड़ता है और एक सीमा के बाद समस्या शुरू हो जाती है।

अत्यधिक शारीरिक श्रम, गिरने, फिसलने, दुर्घटना में चोट लगने, देर तक ड्राइविंग करने से भी डिस्क पर प्रभाव पड़ सकता है। उम्र बढ़ने के साथ हड्डियां कमज़ोर होने लगती हैं और इससे डिस्क पर ज़ोर पड़ने लगता है।


कैसे बचें

नियमित तीन से छह किमी प्रतिदिन पैदल चलें। यह सर्वोत्तम व्यायाम है, हर व्यक्ति के लिए। देर तक स्टूल या कुर्सी पर झुक कर न बैठें। अगर डेस्क जॉब करते हैं तो ध्यान रखें कि कुर्सी आरामदेह हो इसमें कमर को पूरा सपोर्ट मिले।

शारीरिक श्रम मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, लेकिन इतना भी परिश्रम न करें कि शरीर को आघात पहुंचे। देर तक न तो एक ही पोस्चर में खड़े रहें और न ही बैठें रहें। किसी भी सामान को उठाने या रखने में जल्दबाजी न करें। पानी से भरी बाल्टी उठाने, अलमारियां-मेज़ खिसकाने, भारी सूटकेस उठाते समय सावधानी बरतें।

ये सारे कार्य आराम से करें। अगर भारी सामान उठाना पड़े तो उसे उठाने के बजाए धकेलकर दूसरे स्थान पर ले जाने की कोशिश करें। हाई हील्स और फ्लैट चप्पलों से बचें। अध्ययन बताते हैं कि हाई हील्स से कमर पर दबाव पड़ता है।

साथ ही पूरी तरह फ्लैट चप्पलें भी पैरों के आर्च को नुकसान पहुँचाती है, जिससे शरीर का संतुलन बिगड़ सकता है।


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