आजादी का पच्चहत्तरवां साल है, इस आजादी की लड़ाई लड़ने वाली वह पीढ़ी प्राय: समाप्त हो गई। जिस पीढ़ी ने उनकी जवानी के किस्से सुने उस भयावहता को उनके चेहरे पर देखा वह पीढ़ी भी वृद्धावस्था के गलियारे में नजर आ रही है। आज की युवा पीढ़ी स्वतंत्र भारत में जन्मी, पली, पढ़ी। कैसा था वो दौर, क्या होती होगी गुलामी, सदियों कितना हुआ शोषण, अत्याचार का अभ्यस्त समाज, भूला हुआ स्वतंत्रता का अर्थ, कैसे उठा उसका विचार, कैसे जगी आजादी की अलख, कितना बड़ा था वो बलिदान, कितनी लंबी थी वो जद्दोजहद, कैसे जमा वो जज्बा, ये आज की युवा पीढ़ी नहीं जानती। थोड़ा बहुत वह ही समझ पाते हैं जो इतिहास के विद्यार्थी हैं। वे ही अब इस प्रकरण के जानकार हैं।

अपनी आजादी का महत्व और उसे पाने का बलिदान हर पीढ़ी को बतलाना और समझाना बहुत जरूरी है। अपने देश को संभालने की जवाबदारी हर देशवासी की है। देश सरकारों से नहीं बनते, सरकारें देश में बनती हैं। सरकारें आती जाती रहती हैं किंतु देश का स्थायित्व हर नागरिक की जवाबदारी है।
जागरूक रहकर हमें देशधर्म निभाना होगा। इंटरनेट और सोश्यल मीडिया के इस युग में पूरे विश्व की जानकारी हमारी मुठ्ठी में रहती है। प्रजातांत्रिक देशों में संघीय संघटनाओं वाले राष्ट्रों में, सत्ता का केंद्रीयकरण किस प्रकार लोकतंत्र को अधिनायकवाद की ओर ले जा रहा है इसकी अनेकों नजीर हमारे सामने हैं। बांंग्लादेश का ताजा ताजा उदाहरण हमने देखा है। लम्बे संघर्ष से पाई इस आजादी को संभालना और देश को प्रगति पथ पर पहुंचाना हर देशवासी की पैत्रक जवाबदारी है। सरकारों को अपनी जवाबदारी निभाने के लिये निरन्तर प्रेरित करना हमारा राजधर्म है। कमजोर विपक्ष के रहते जन-जन की जागरुकता अपने अधिकारों की मांग देश को अच्छी दशा में ले जाना और सरकारों की व्यवस्था को सुदृढ़ बनवाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
जाने वाले कह गये- हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकालकर, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के।
सम्भालिये और अच्छे से सम्भलिये।










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